-ः श्रीकृष्ण की आल्हादिनी शक्ति:

-पंण्ड्या सुनील नागर 
परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण को जब सृष्टि रचने की इच्छा प्रकट हुई तो वे स्वयं दो रूप में प्रकट हुए, पुरूष और प्रकृति। उनका आधा दाहिना अंग ‘पुरूष’ और आधा बांया अंग ‘प्रकृति’। ‘प्र’ का अर्थ है प्रवीण और ‘कृति’ का अर्थ सृष्टि अर्थात् जो सृष्टि करने में परम प्रवीण है, उसे देवी प्रकृति कहते हैं। यही प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी माया है। जैसे परमात्मा श्रीकृष्ण है, वैसी ही उनकी शक्ति स्वरूप प्रकृति है अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के सभी अनुरूप गुण इन प्रकृति में निहित है ठीक उसी प्रकार से जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति सदा विराजमान रहती है। परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार सृष्टि की रचना के लिए ये पाँच विविध रूप धारण करती है। 
गणेश माता दुर्गाया शिवरूपा शिवप्रिया, 
नारायणी विष्णुमाया पूर्णब्रह्म स्वरूपिणी। 
ब्रह्माद्विदैवैमुनि भिर्ममुनिभः पूजिता सदा,
 सर्वाधिष्ठाठदेवी सा ब्रह्मरूपा सनातनी।।
पहली शक्ति गणेश की माता दुर्गा, शिव (कल्याण) रूपा शिव की प्रेयसी भार्या है। उस पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी, नारायणी, विष्णु की भाया का ब्रह्मादि देवगण, मुनिगण और मनुगण सदैव पूजन करते रहते हैं। यह सबकी अधिष्ठात्री देवी एवं सनातनी ब्रह्मरूपा है। ये सर्वशक्ति स्वरूपा और भगवान शंकर को निरन्तर शक्तिशाली बनाये रखती है। सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, शक्ति, श्यन्ति, तृष्टि, जाति, और चेतना आदि नामों से जान जाती है। 
शुद्धासत्व स्वरूपा या पदमा च परमात्मनः,
 सर्वसंपत्स्वरूपा या तदधिष्ठातृदेवता।
दूसरी शक्ति परमात्मा विष्णु की शक्ति, पदमा, शुद्ध सत्वस्वरूपा, समस्त सम्पत्ति स्वरूपा तथा सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी है। ये परम सुन्दरी, अनुपम ंयमरूपा अत्यन्त, शान्तरूपा, संुशीला और सर्वमंगल मयी है। ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अहंकार से रहित है। भक्तों पर अनुग्रह करना इनका स्वभाव है। ये ही स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी, राजाओं की राजलक्ष्मी और घरों में गृहस्थ मनुष्यों की गृहलक्ष्मी, बनियों में व्यापार रूप में और पापियों में कलह के रूप में विराजती है। 
वाम्बुद्धि विधाज्ञानाधिदेवता परमात्मनः, 
सर्वविद्यास्वरूपा या सा च देवी सरस्वतीं। 
तीसरी शक्ति परमात्मा की वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सर्वविद्या स्वरूपा देवी ‘सरस्वती’ है। मनुष्य की बुद्धि, प्रतिभा, ज्ञान और स्मरण शक्ति इन्हीं से प्राप्त होती है। इन्हें विचारकरणी और गन्थकरणी कहा जाता है। सम्पूर्ण संगीत की संधि और ताल का कारण इनका ही रूप है। इनका एक हाथ व्याख्या की मुद्रा में सदा उठा रहता है। 
यथागयं यथाकिंचिदपरां सानिबोध में,
 माता चतुर्था वेदांगना च च्छन्दसाम्। 
स्नध्यावंदनमन्त्रायां तन्त्राणां च विघक्षणा,
 द्विजातिजातिरूपा च जपपा तपस्विनी।।
ब्राह्मणयते जो रूपा च सव्रस्कारकारणी, 
पवित्ररूपा सावित्री गायत्री ब्राह्मणः प्रिया।
चौथी शक्ति चारों वेदों, वेदांग, छन्दः, शास्त्र, संध्यावदन के मन्त्रों एवं तन्त्रों की जननी है द्विजाति वर्णो के लिए उसने अपना यह रूप धारण किया है। यह जपरूपा, तपस्विनी, ब्रह्मण्यतेजोरूपा समस्त संस्कारों को सुसम्पन्न करने वाली ‘सावित्री’ अथवा ‘गायत्री’ है। ये ब्रह्मा की प्रिय शक्ति हैं। ये देवीशुद्ध स्फटिक के समान कान्तिवाली, परमानन्दस्वरूपा, परमा, सनातनी, परब्रह्मरूपा, ब्रह्मतेजोमयी शक्ति और उसकी अधिष्ठात्री देवी है।
प्रेमप्राणाधि दवेी या पंचप्राण स्वरूपिणी, 
प्राणाधिक प्रियतमा सर्वाधा सुन्दरीवरा।
सर्वसोम्याग्ययुक्ता च मानिनी गौरवान्विता, 
प्राणधिष्ठातु देवी च वस्यैव परमात्मन।।
पाँचवी शक्ति प्रेम और प्राणों की अधिदेवी तथा पंचप्राणस्वरूपणी है। सम्पूर्ण शक्तियों में सबसे अग्रणीय एवं सबकी अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर है। सौभाग्य सम्पदा और गौरवशालिनी है। ये परमात्मा श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी है उनकी आत्मा है। गोलोक में वास करने वाली ये देवी सुरसिका और रासेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। ये ब्रह्म के समान ही गुण एवं तेस से सम्पन्न है। सुरेन्द्र एवं मुनीन्द्र समस्त प्रधान देवता अपने चर्मचक्षुओं से इन्हें देखने में असमर्थ है। ब्रह्मा ने इनके दर्शन मात्र करने के लिए साठ सहस्त्र वर्षो तक तपस्या की थीं। भगवान श्रीकृष्ण से रासमण्डल में उनके वामपार्श्व से ये प्रकट हुई थी। ईन्हें परावरा परमाया, सारभूता, सनातनी, धन्या, मान्या, पूज्या परमानन्दरूपा भी कहा जाता है। ये नित्य निकुंजेश्वरी, रासक्रीड़ा की अधिष्ठात्री देवी हैं। 
आत्मातु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ,
 आत्माराम इति प्रोक्तो मुनि भिगूंठ वेदेभिः।
राधा पूज्य च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान प्रभू,
 परस्पराभीष्टदेवों भेदकृतनरकं ब्रजेव।।
श्री राधा भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा है उनके साथ सदा रमण करने के कारण रहस्य रस के मर्मज्ञ ज्ञानी पुरूष श्रीकृष्ण का नाम ‘आत्माराम’ है। राधाकृष्ण की पूजनीय है और श्रीकृष्ण राधा के पूज्य, वे एक दूसरे के इष्ट देवता है। उन दोनों में अन्तर करने वाला नरक का भागी होता है। 
‘कृष्णर्चायां नाधिकारो यतो राधार्चनं बिना, 
वैष्णवः सकतैस्तस्मात् कर्तव्यं राधिकार्चनम्।
श्रीकृष्ण की आल्हादिनी शक्ति के रूप में श्रीराधा की मान्यता सर्वोपरि है, राधा के बिना श्रीकृष्ण को अधूरा कहा गया है, यदि राधा की उपासना न की जाये तो मनुष्य श्रीकृष्ण की पूजा का अनाधिकारी माना जाता है, इसलिये समस्त वैष्णवों को चाहिये कि वे भगवती राधा की उपासना अवश्य करें। 
श्रीकृष्ण सदा राधा की आराधना करते हैं, इसलिये ये ‘राधा’ है तथा ये सदैव श्रीकृष्ण की आराधना करती है, इसलिये इन्हें राधिका कहा जाता है।यह देवी प्रेम और प्राणीं की अधिदेवी तथा पंचप्राण स्वरूपणी है। श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण शक्तियों में सबसे अग्रणीय एवं सबकी अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर है। 
      पुराण में श्रीराधा के पृथ्वी पर प्राक्टय होने के सम्बंध में बताया गया है कि गौलोक में एक बार श्रीकृष्ण विरजा नामक सखी के साथ विहार कर रहे थे। विरजा के साथ श्री कृष्ण को देखकर श्रीराधा क्रोधित हो गयी और श्री कृष्ण को भला बुरा कहने लगी। श्रीदामा ने जब श्रीकृष्ण को भला बुरा कहने से श्रीराधा को रोकने का प्रयास किया तो श्रीराधा और क्रोधित हो गयी एवं श्रीदामा को राक्षस योनी में जन्म लेने का शाप दे दिया। इसी शाप के कारण श्रीदामा शंखचूड़ नामक असुर बना । श्रीदामा ने भी आवेश में आकर श्रीराधा को पृथ्वी पर जन्म लेने एवं श्रीकृष्ण से विरह का शाप दे दिया। क्रोध शान्त होने पर श्रीराधा को बहुत दुःख हुआ तब श्रीकृष्ण ने राधा से कहा कि आप विचलित ना हो पृथ्वी पर आप देवी कीर्ति और वृषभानृ की पृत्री के रुप में, गोकुल क्षेत्र में ; वर्तमान में रावल गॉव द्ध जन्म लोगी और शीघ्र ही में भी पृथ्वी पर जन्म ले लूगॉ। भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री राधा का रावल गॉव में प्राक्टय हुआ था । बाद मेें कंस के उपद्रवों से तंग आकर नन्द बाबा और वृषभानु क्रमशः वर्तमान नन्द गॉव और बरसाने में रहने लगे। 
    
       वैसे तो श्रीराधा का जन्म दिन सभी स्थानों पर मनाया जाता है किन्तु बृज में बड़ी जोर शोर से विशेष कर जन्म स्थान रावल में, क्रीड़ास्थली बरसाने में एवं वृन्दावन में घूमधाम से मनाया जाता है।
श्रीराधा और श्रीकृष्ण एक-दूसरे के परस्पर अराध्य और अराधक है। संतों का कथन है कि उनमें सभी दृष्टियों से पूर्ण समानता है। मानव मात्र ही नहीं, अपितु देवगण भी इनके चरणों की धूल मात्र को ही स्पर्श करने की अभिलाषा रखते हैं, तभी तो किसी ने कहा है:-
राधे तेरे चरणों की, 
श्यामा तेरे चरणों की, 
धूल जो मिल जाये।
सच कहता हूँ मैं,
 मेरी तकदीर ही बदल जाये। 
पंण्डया सुनील नागर,
550-बिहारीपुरा, मथुरा (उ.प्र.)

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