अधर्म से बचें क्योंकि हनुमानजी देख रहे

हनुमानजी त्रेतायुग में जन्में लेकिन श्रद्धालुओं का विश्वास है कि वो इस कलयुग में भी विद्ययमान हैं। इसलिए हनुमानजी के जीवन से जहां बहुत कुछ सीखा जा सकता है, वहीं उनके होने का आभास भी किया जा सकता है। त्रेतायुग में बजरंगबली विषम परिस्थितियों का जब सामना करते थे, तो पूरी तरह वो जागरुक रहते थे। उनके जीवन में अनेक दफा ऐसी परिस्थितियां आईं जबकि उन्हें सहमति और विरोध करना पड़ा। ऐसे समय में उन्होंने बेहतर तरीके से खुद को उबारा। उन्होंने भगवान श्रीराम यानी धर्म के विषय में जब भी बात आई अपनी पूर्ण सहमति दी, और जब अधर्म सामने आया तो उसका डटकर मुकाबला भी किया और असहमति भी जताई। गौरतलब है कि बालि द्वारा अपने ही भाई की पत्नी का अपहरण करने पर वह मित्र सुग्रीव की सहायता के लिए तत्पर नजर आए। ऐसा ही एक और प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में देखने को मिलता है। यथा- बजरंगबली जब लंका में प्रवेश कर रहे थे तब लंका की सुरक्षा अधिकारी लंकिनी के सामने वह बहुत छोटे आकार में थे। तब लंकनी ने उन्हें पकड़ लिया। लंकिनी ने बजरंगबली से कहा- जानेहि नहीं मरम् सठ मोरा। मोर अहार जहां लगि चोरा।। अर्थात् तुमने मेरा भेद नहीं जाना। जितने चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। लंकिनी की बात पर हनुमानजी ने कहा- ‘तुम मुझे क्या चोर बता रही हो, दुनिया का एक बड़ा चोर रावण हमारी मां सीता को चुरा लाया है।’ इस तरह इन दोनों ही प्रसंग से इस बात की सीख मिलती है कि यदि आप सही हैं तो सच के साथ खड़े रहिए, जीत आपकी ही और सिर्फ आपकी ही होगी। समझों कि कलयुग में भी हनुमानजी मौजूद हैं।

 

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