दंतेवाडा हमले में मारे गए लोगों के प्रति दुख व्यक्त करता हूं: आनंद शर्मा

 नई दिल्ली (श्रीजी एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क)।  आनंद शर्मा ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि सबसे पहले जो छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला हुआ है, ये बड़ी दुखदायी और चौंकाने वाली घटना है, जिसमें दूरदर्शन का एक कैमरामैन अचुता नंद साहू, उनकी मृत्यु हुई है और पुलिस कर्मियों की भी मृत्यु हुई है। इसमें छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और उसके साथ-साथ केन्द्र सरकार की, गृहमंत्री की, गृहमंत्रालय की जवाबदेही बनती है कि जब चुनाव की तैयारी हो रही है, कुछ दिन के बाद पहले चरण का मतदान होना है, अगर सुरक्षा के प्रबंध सरकार की तरफ से, शासन-प्रशासन की तरफ से मजबूत नहीं थे, उसके लिए हमने ये कहा है कि माननीय गृहमंत्री, जिन्होंने कुछ दिन पहले ये बयान दिया था कि नक्सलवाद को उनकी सरकार पूर्ण रुप से खत्म कर देगी, उस बात के लिए हमारा भी पूरा अनुमोदन है, पर इससे यही सोच बनती है कि सरकार पूरी तरह से सचेत है, खासतौर पर चुनाव के दौरान किसी भी तरह की कोई ऐसी घटना ना हो, कोई हमला ना हो। चाहे वो उम्मीदवार हैं, राजनैतिक दलों के नेता जो प्रचार में जाएंगे, पत्रकार हैं, सुरक्षाकर्मी हैं, वो सुरक्षित रहेंगे। हम अपनी और से, कांग्रेस की तरफ से उन सब लोगों के लिए, दूरदर्शन का कैमरामैन अचुता नंद साहू जी के परिवार के लिए और जो पुलिसकर्मी इसमें आहत हुए हैं, दुख व्यक्त करते हुए अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं।

बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की निगेहबानी में जो सरकार काम कर रही है, उसने बड़ी सुनियोजित तरीके से देश की हर उस संस्था को चोट पहुंचाई है, जो इस देश के शासन-प्रशासन के लिए आवश्यक है, देश की व्यवस्था के लिए, जिनकी अहम भूमिका है, देश के वित्तीय संतुलन को और देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने की भी अहम जिम्मेवारी है, उन सभी संस्थाओं पर सरकार की चोट लगी है। हमने इस बात को कई बार पहले भी कहा, सरकार को सचेत किया कि जो संस्थाएं ऑटोनोमस हैं या जिनसे ये अपेक्षा की जाती है कि वो निष्पक्षता से अपना काम करें, उसमें दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिए। इस सरकार ने हर ऐसी संस्था को सरकार के डिपार्टमेंट और महकमे की तरह से समझना शुरु किया। ये सोच का, नीयत का और मानसिकता का भी प्रश्न आ जाता है, चाहे वो जो भी जांच ऐजेंसीज देश की हैं, एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट है, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस है, इंकम टैक्स इंटेलिजेंस है, सीबीआई है, इनमें हस्तक्षेप और इनका दुरुपयोग करके सरकार ने इनकी विश्वसनीयता को खत्म किया। उसी तरह शिक्षा संस्थाओं में निरंतर हस्तक्षेप हुआ, चाहे वो यूजीसी है या हमारे विश्वविद्यालय हैं, जहाँ आज एक ऐसा वातावरण बना है कि स्वतंत्र विचार व्यक्त करना और वहाँ पर जो प्रोफेसर हैं, अध्यापक हैं, उन्हें भी अपनी निष्पक्ष, स्वतंत्र बात कहने की अनुमति हमारे देश के कैंपस में नहीं है।

पर सबसे बड़ी गंभीर बात जो हाल की है, अभी सीबीआई में जो हुआ है और जो हो रहा है, वो देश और दुनिया देख रही है। जिस तरह से मध्यरात्रि के बाद प्रधानमंत्री का स्वयं हस्तक्षेप हुआ, उनके कार्यालय का हस्तक्षेप हुआ, वो विषय अब सर्वोच्च न्यायालय के पास है और जांच के बाद वो सब सामने आएगा। उसके भी जो यह आज हालात बने हैं, उसके पीछे यही एक सोच थी और संस्था जिसका मैंने जिक्र नहीं किया, उसको भी इन्होंने, इस सरकार ने पूरी तरह से कॉम्प्रोमाईज किया है, वो सीवीसी है। कोई संस्था नहीं, जिसको आप कह सकें कि ये सही रुप में ऑटोनोमी अपनी रखती है, स्वायत्तता रखती है और निष्पक्ष रुप से काम करने में सक्षम है। गंभीर बात ये है कि अब सरकार का निशाना भारत के रिजर्व बैंक पर है। रिजर्व बैंक की ऑटोनोमी पर बड़ा हमला हो रहा है। ये जानना जरुरी है कि सेंट्रल बैंक, जो देश की वित्तीय नीति होती है, मॉनिटरी पॉलिसी होती है, वो केन्द्रीय बैंक देखता है, बैंक जो कर्जा देते हैं, किस रेट पर देते हैं, कितना पैसा उनको रखना अनिवार्य है, वो भी रिजर्व बैंक तय करता है। जो पब्लिक सेक्टर बैंक है, उनके एनपीए पर भी नजर रिजर्व बैंक रखता है और भारत के रिजर्व बैंक ने कई दशकों से अच्छा काम किया है, इसलिए उसकी आजादी पर किसी तरह का आघात नहीं होना चाहिए था। पर इस सरकार ने वो अनुमति रिजर्व बैंक को नहीं दी। ये बात शायद बताना जरुरी है कि आपके यहाँ आर्थिक स्थिरता रहे, फिस्कल स्टेबिलिटी रहे, उसके लिए आरबीआई की मुख्य भूमिका है। सरकार के और रिजर्व बैंक के बीच में एक फर्क होना लाजमी है, वो इसलिए भी कि रिजर्व बैंक जो है वो मनी क्रिएटर है, मॉनिटरी अथोर्टी भी है और सरकार खर्चा करती है। तो जो सरकार खर्चा करती है, वो स्वयं ही अथोर्टी नहीं बन सकती है। एक बहुत बड़ा फर्क है, जो हमेशा आवश्यक समझा गया है, हर उस देश में जहाँ अर्थव्यवस्था एक सुचारु रुप से चलती है। अगर सरकार और आरबीआई के बीच में फर्क ना हो, जैसा मैंने कहा, स्पेडिंग अथोर्टी और मॉनिटरी अथोर्टी के बीच में, तो देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लग सकता है।

मुझे हैरानी है कि जो आशंकाएं जताई गई, रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर के द्वारा, दूसरे इकोनॉमिस्ट के द्वारा, जानकार लोगों के द्वारा, वित्त मंत्री ने उस पर चिंता करने की जगह और अपने गिरेबान में झांकने की जगह, आरबीआई की आलोचना की है। देश के वित्त मंत्री ने आज आरबीआई पर निशाना लगाया है और उन्होंने आरबीआई को दोषी ठहराया है कि 2008 और 2014 के बीच में इनका इंतजाम ठीक नहीं रहा, निगेहबानी ठीक नहीं रही, कर्जे पीएसबी ने दे दिए, हर चीज का दोष आरबीआई पर डालने की कोशिश की। बुनियादी बात एक है, मैं उसका भी जिक्र करुंगा कि वित्त मंत्री को ये बताना चाहिए कि जब 2014 में ये वित्त मंत्री बने और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश में एनपीए 3 लाख करोड़ थे, आज वो 12 लाख करोड़ कैसे बने? वो 9 लाख करोड़ की जिम्मेवारी किसकी है, वो भी पिछली सरकार है, वो भी आरबीआई के भूतपूर्व गवर्नर की है या इस सरकार की सीधी जिम्मेवारी है?

दूसरी बात, क्या अधिकार है इस सरकार को कि अभी जो विवाद शुरु हुआ है, उसके 3-4 मुख्य कारण हैं। पहला कारण, ये सरकार मॉनिटरी पॉलिसी अपने कब्जे में लेना चाहती है। दूसरा कारण, वित्त मंत्रालय की ये पेशकश कि एक इंडिपेंडिड पेमेंट रेगुलेटरी बॉडी कायम की जाए, पेमेंट रेगुलेटर देश का रिजर्व बैंक है, वो वित्त मंत्रालय अपने आप अपने हाथ में नहीं ले सकता, अपने कब्जे में नहीं ले सकता और कोई ऐसी नई संस्था नहीं बना सकता, जो भारत देश का पेमेंट रेगुलेटर बने। तीसरा, जो नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कॉरपोरेशन है, उसके लिए ये सरकार अलग से खिड़की खोलना चाहती है ताकि अभी जो बर्बादी हुई है, उससे भी आगे बढ़कर उनके लिए भी एक फाइनेंशियल खिड़की खोली जाए, उनको भी पैसा देना चाहिए। ऐसे लोग जो बैंकिंग के बारे में ज्ञान नहीं रखते, उनको रिजर्व बैंक का डॉयरेक्टर बना दिया गया, इंडिपेंडिड डॉयरेक्टर के नाम पर, नोन ऑफिशियल डॉयरेक्टर के नाम पर, जो रिजर्व बैंक की सब कमेटी में बैठ कर फैसलों को प्रभावित करते हैं। इसलिए रिजर्व बैंक के वरिष्ठ लोगों को चिंता है कि इस संस्था को केवल कमजोर नहीं किया जा रहा है, बल्कि ऐसी परिस्थियों में डाला जा रहा है कि वो अपने देश के प्रति जिम्मेवारी, जो उनकी संवैधानिक जिम्मेवारी है, उसको पूरा करने में असहाय ना हो जाए। बेहतर ये होता कि वित्त मंत्री रिजर्व बैंक के गवर्नर और अधिकारियों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करते क्योंकि ये विवाद देश के हित में नहीं है। मोदी जी को, अरुण जेटली जी को बहस की आदत है, सच्चाई को नकारने की आदत है, झगड़ा करने की मानसिकता है, पर वित्त मंत्री रिजर्व बैंक से झगड़ा करे, ये स्वीकार्य नहीं है। 

तो ये आज वित्त मंत्री का कहना कि हमारा रिजर्व बैंक जो है, सही मायने में कॉम्पीटेंट नहीं है, योग्य नहीं है, इससे बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण बात नहीं हो सकती। मेरी सलाह है वित्त मंत्री ये शब्द वापस लें। उन्हें माफी मांगनी चाहिए रिजर्व बैंक को इस तरह से प्रताड़ित करनी के लिए। जैसा मैंने आरंभ में कहा कि ये पहला वाक्या नहीं है, आरंभ से ये मानसिकता चल रही है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण 8 नवंबर, 2016 को देश और दुनिया ने देखा था, जब भारत की 85 प्रतिशत करंसी को प्रधानमंत्री ने इनवेलिडेट कर दिया था, रद्द कर दिया था। वो रिजर्व बैंक पर पहली बड़ी चोट थी कि रिजर्व बैंक के बोर्ड को कमरे में बंद करके मजबूर किया गया, एक घंटा पहले। फैसले तो पहले हो गए थे, रिजर्व बैंक को नोटबंदी की कोई जानकारी नहीं थी, रिजर्व बैंक की सलाह नहीं थी, उनकी सिफारिश पर ये नहीं किया गया था, वरना रिजर्व बैंक तैयारी करता, नोट छाप कर रखता और जो देश में कोहराम मचा, 53 दिन तक, जो देश के नागरिक कतारों में खड़े किए गए, एटीएम के बाहर, बैंकों के बाहर, जो बैंकों में अपना पैसा जमा था, उसकी भीख मांगने के लिए नरेन्द्र मोदी जी ने और बीजेपी सरकार ने हिंदुस्तान के लोगों को मजबूर किया था, ये सब ना होता। ये याद दिलाना आवश्यक होता है वित्त मंत्री को, कि ये दोष किसपर डालना चाहते हैं प्रधानमंत्री पर या रिजर्व बैंक पर? ये प्रश्न सीधा उठता है। वो चोट और उसके बाद निरंतर दखलअंदाजी और अबकी चोट जो बार-बार हो रही है और आज जो वित्त मंत्री ने कहा है, इसलिए हम उनको उस बात के लिए सचेत करना चाहते हैं कि जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उस पर ना चलें। मैं पहले इस पर कह चुका हूं, मेरे साथी कह चुके हैं, नरेन्द्र मोदी जी और वित्त मंत्री, दोनों अयोग्य रहे हैं। जहाँ तक भारत की इकोनॉमी की व्यवस्था का प्रश्न है, उसको इन्होंने चरमरा दिया है, क्योंकि इनके पास ना सोच है, नीतियाँ गलत है और दिशा भी गलत है। इनको सोचना चाहिए कि भारत की इकोनॉमी को ये कहाँ लेकर चले गए हैं। जैसा मैंने कुछ दिन पहले कहा था, क्या कारण है कि एक तरफ ये कहना कि सबसे तेजी से बढ़ती हुई जीडीपी है और इकोनॉमी है और दूसरी तरफ से उस इकोनॉमी में इन्वेस्टमेंट नहीं है, निवेश नहीं है, वो इकोनॉमी रोजगार पैदा नहीं कर पा रही है। वहाँ कारखाने बंद हो रहे हैं, नए कारखाने नहीं लग रहे हैं और वह इकोनॉमी का जो सबसे तेजी से आगे बढ़ रही थी, उसमें अब  रुपया भी सबसे ज्यादा टूट गया।

इस विषय पर मुझे केवल इतना ही कहना था। एक आवश्यक टिप्पणी मैं समझता हूं आपके माध्यम से देश तक पहुंचाने की। वो दूसरा विषय है, देश की विदेश नीति का जो बहुत चिंता का विषय है। इस सरकार की जो नीति रही है, इनकी कूटनीति में गंभीरता नहीं है, ना प्रधानमंत्री कूटनीति समझ पाए अभी तक कि किस तरह अपने जो महत्वपूर्ण पार्टनर हैं, देश हैं, बड़े देश हैं, उनके साथ संबंधों में संतुलन कैसे रखना है और अपनी स्वायत्तता और आजादी विदेश नीति की कैसे बना कर रखना है, वो नरेन्द्र मोदी जी नहीं समझ पाए हैं। आरंभ के कई साल वो कूटनीति को फोटो अपॉर्चुनिटी समझते रहे। अभी भी आप देखें तो जो हमारा पड़ोसी देश हैं, सबसे अहम हिस्सा होता है विदेश नीति का कि पड़ोस देश से किस तरह के आपके संबध बनते हैं और आप कैसे वहाँ पर जो आवश्यक संतुलन है, वो बना कर रखते हैं। वो नहीं कर पाए, आज भी जो स्थिति है, अच्छी नहीं है, चिंता की है। हम केवल आलोचना के लिए नहीं कह रहे हैं, आप सब लोग भी समझते हैं क्योंकि, ज्यादा दूर निगाह दौड़ाने की जरुरत नहीं है, हमारे पूरे पड़ोस के अंदर जो हालात हैं, वो शायद भारत के लिए चिंता का विषय है। अभी परसों भारत को शर्मिंदगी उठानी पड़ी और सरकार की तरफ से चुप्पी है। सरकार ने यूं गैर सरकारी सूत्रों के द्वारा आप लोगों तक बात पहुंचाई कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का जो दावतनामा था, आमंत्रण था, उनको भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रुप में आने का, वो स्वीकार कर लिया। 1950 के बाद पहली बार है, जबसे गणतंत्र दिवस देश मना रहा है, क्योंकि बहुत बडा सम्मान देने की बात होती है, जब भारत देश किसी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष को या सरकार के मुखिया को बुलाता है और कभी भी उसको अस्वीकार नहीं किया गया।

एक प्रश्न पर कि जो देश के हालात हैं, उसके लिए कांग्रेस के क्या विचार हैं, श्री शर्मा ने कहा कि देश के लिए अगर बुरा हो, जिसमें देश का नुकसान हो, तो कांग्रेस को खुशी नहीं होती है। जिस तरह से नोटबंदी हुई, वो उत्सव का विषय नहीं था, वो देश के लिए मातंम का दिन था और वो मातंम का समय महीनों चलता रहा और आज तक वो जख्म भरे नहीं हैं। तो अगर आज देश की संस्थाओं को नष्ट किया जाता है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगता है, पूरे देश में आशंका होती है कि क्या उनके अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं हैं, एक संवैधानिक प्रजातंत्र में, उससे कांग्रेस पार्टी कभी भी संतोष प्राप्त नहीं कर सकती है। हम उसके बारे में अपने विचार व्यक्त करना आवश्यक समझते हैं, सरकार को चेताना आवश्यक समझते हैं और प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की आलोचना करना आवश्यक समझते हैं।

कहा कि हमारे देश के प्रधानमंत्री ने देश को तकलीफ दी थी, 8 नवंबर को और जो भी 4 कारण बताए थे, वो सब झूठे साबित हुए, गलत साबित हुए। बिना रिजर्व बैंक की सिफारिश के, उसे बिना सलाह-मशवरा किए गलत फैसला किया गया। 85 प्रतिशत देश की जो करंसी थी, उसको खत्म किया गया, पूरी दुनिया में भारत को बदनाम किया गया कि भारत की इकॉनोमी कालेधन पर चलती है और वो जो पैसा जनता का था, उसको आतंकवादियों का बताया, उसको काउंटर फीट करंसी बताया, उसको कालाधन भी बताया और वो 99.6 प्रतिशत वापस आ चुका है, अगर नेपाल, भूटान वाला भी वापस ले आओ तो मुश्किल से 00.001 शायद रह जाएगा। तो ये एक वास्तविकता है, देश को बताना हम अपना कर्तव्य समझते हैं, पर ये आपका भी तो कर्तव्य है, आपमें भी तो बहुत लोगों को यही परेशानी उठानी पड़ी, हम सबका कर्तव्य बनता है कि देश को याद कराया जाए, वो काला दिन, जिस दिन नरेन्द्र मोदी जी ने इतना बड़ा हमला भारत की इकॉनोमी पर किया था।  

एक अन्य प्रश्न पर कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जी पर शिवराज सिंह चौहान के बेटे ने मानहानि का मुकदमा दायर किया है, क्या कहेंगे, श्री शर्मा ने कहा कि ना तो राहुल गाँधी जी ने कुछ ऐसा कहा। सवाल ये है कि अगर कोई एक आधे मुख्यमंत्री के बारे में होता और जिसके नाम के पीछे सिंह लगा हो, तब तो आप इसको गलती मान सकते हैं। अब कई राज्यों में राहुल गाँधी जी चुनाव के लिए जा रहे हैं, कभी छत्तीसगढ़ जा रहे हैं, कभी राजस्थान जा रहे हैं, कभी मध्यप्रदेश जा रहे हैं और तीनों मुख्यमंत्रियों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, ये तो एक वास्तविकता है। तीनों के बारे में हमने जांच की मांग की है और प्रधानमंत्री, सरकार ने उसको स्वीकार नहीं किया है। तो गलती से अभी, छत्तीसगढ़ जाना है तो दिमाग में रहता है कि रमन सिंह जी के पुत्र का नाम आया है पनामा कागजों में। जहाँ तक शिवराज सिंह जी का प्रश्न है, ये भी कोई गंगा नहाए हुए तो नहीं हैं, कितने भ्रष्टाचार के आरोप हैं इनकी सरकार पर, कॉन्ट्रैक्ट देने के हैं, बड़े प्रोजेक्ट के टेंडर देने के आरोप है, व्यापम का बड़ा घोटाला है। तो तकलीफ तो उनको होनी चाहिए, सही मायने में जिसकी चादर सफेद हो। इनकी चादर दागदार है, व्यापक भ्रष्टाचार है। तो मुझे हैरानी है कि उनको कष्ट हुआ, नहीं होना चाहिए। वो इतनी बड़ी बात नहीं है। वो दूसरे का बेटा तो है ना, प्रधानमंत्री दूसरे के बेटे के बारे में बता दें। मान लिया हमने कि रमन सिंह का बोलना था, शिवराज सिंह  पर बोल दिया, एक सिंह, दूसरा सिंह, पर आरोप तो दोनों सिंहों पर हैं और जो लाभांवित हुए हैं, 

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि जिस देश का प्रधानमंत्री हमेशा ही कन्फ्यूज रहता हो, राहुल गाँधी जी प्रधानमंत्री नहीं हैं, कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। प्रधानमंत्री भी तो भूले, उनसे क्यों नहीं पूछते। उनसे बड़ी कन्फ्यूजन कोई हो सकती है, जिन्होंने संत कबीर जी, गुरुनानक देव जी, गोरखनाथ जी, जिनको एकसाथ बैठा दिया, जो अलग-अलग सदी में पैदा हुए। इससे बढ़कर कन्फ्यूजन क्या हो सकता है, ये तो एक सिंह का दूसरे सिंह से नाम मिक्सअप हो गया। तो ये तो बीजेपी को पहले अपने प्रधानमंत्री को समझाना चाहिए, आरोपी तीनों हैं, चाहे वो रमन सिंह हो, चाहे शिवराज सिंह हों, चाहे वसुंधरा राजे सिंधिया हो।     

मालेगांव ब्लास्ट मामले पर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि भारत कई वर्षों से आतंकवाद का शिकार रहा है। सीमा के बाहर से, देश की सीमाओं के अंदर हिंसा और आतंकवाद की घटनाएं हुई हैं, उनकी पुरजोर निंदा होनी चाहिए, उनका मुकाबला होना चाहिए और उनको शिकस्त दी जानी चाहिए, उनको पराजित करना राष्ट्रीय हित में है और अगर कोई ऐसी घटना है, जहाँ भी घटी हो, जो भी दोषी हों, आरोपी हों उनके खिलाफ देश के कानून को कार्यवाही करने का अधिकार है। हमारी ये मान्यता है कि आतंकवाद को किसी धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आतंकवाद, आतंकवाद है, इसलिए उसको पराजित करना चाहिए। 

एक अन्य प्रश्न पर कि बीजेपी कह रही है कि भगवा आतंकवाद ऐसी कोई टर्म नहीं है ये कांग्रेस ने क्रिएट की हुई है, श्री शर्मा ने कहा कि भगवा शब्द भारतीय जनता पार्टी की बपोती नहीं है। भारतीय जनता पार्टी को गलतफहमी है क्योंकि वो कभी हमारे राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं थे। ये उन लोगों के वारिस हैं, जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और स्वतंत्रता आदोंलन का खुलकर विरोध किया। ये उन लोगों के वारिस हैं, जिन्होंने जब देश में एक बड़ा संग्राम हुआ था, भारत छोड़ो आंदोलन के बाद, जो भारत के नौजवानों को आग्रह करते थे, निवेदन करते थे कि अंग्रेजी फौज में शामिल हो जाओ, उस जंग के लिए जिसमें वो शामिल होने के एक देश के रुप में तैयार नहीं थे। तो जहाँ तक प्रश्न है, भारत का इनको शायद ये भी इतिहास नहीं पता कि कब चर्चा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में पहली बार शुरु हुई थी, भारत के राष्ट्रीय ध्वज की और जब संविधान सभा में राष्ट्रीय ध्वज का नेशनल फ्लेग का प्रस्ताव पेश किया गया था, वो पंडित जवाहरलाल नेहरु जी ने किया था। एक अन्य प्रश्न पर कि कल प्रधानमंत्री जी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा सरदार बल्लभ भाई पटेल के स्टैच्यू का उद्घाटन करेंगे, क्या कहेंगे, श्री शर्मा ने कहा कि क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के पास अपना तो कुछ हैं नहीं, जिससे वो एक चौथाई ऊँचाई की भी मूर्ति लगा सकें। अगर इनके पास कोई होते तो मूर्ति लगाते, अब सरदार पटेल जी तो कांग्रेस पार्टी के थे, सरदार पटेल जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रह चुके थे। उनको सरदार की उपाधि बारडोली सत्याग्रह के बाद महात्मा गाँधी जी ने दी थी। शायद ये नरेन्द्र मोदी जी को नहीं मालूम, बारडोली सत्याग्रह के बाद वल्लभ भाई पटेल जी को सरदार की उपाधि राष्ट्रपिता ने दी थी और उसके साथ-साथ 4 फरवरी, 1948 को उस समय के भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने एक अपने हाथ का लिखा हुआ आदेश जारी किया था, आरएसएस पर पाबंदी लगाने का। मेरी प्रधानमंत्री को सलाह है, मैंने कहा था पहले, आज भी अपील करता हूं कि माननीय प्रधानमंत्री जी चीन की मदद से आप बुत तो बनवा लाए, लगाएं, पर सरदार जी को सही रुप में श्रद्धांजलि ये होगी कि वो नीचे एक कांसे का पट लगाएं, कॉपर प्लेट, जिस पर सरदार पटेल का वो हुक्मनामा, वो आदेश और उसके साथ पत्राचार जो सरदार पटेल जी और गुरु गोलवलकर के बीच में था, उसको प्रतिमा, बुत के नीचे लगा दें।

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