समस्त पापनाशक व स्वर्ग प्रदात्ता है नरक चतुर्दशी को दीप प्रज्वलन

-अशोक “प्रवृद्ध”

दीपावली से एक दिन पूर्व दिवस अर्थात कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की तिथि को नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। यह दिवस नरक चौदस, नर्क चतुर्दशी, नर्का पूजा, रूप चौदस,काली चौदस आदि नाम से भी प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यतानुसार इसी दिन कृष्ण ने एक दैत्य नरकासुर का संहार किया था। सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नानादि से निपट कर यमराज का तर्पण करके तीन अंजलि जल अर्पित करने का विधान है। संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं।लोक मान्यतानुसार धनतेरस के दूसरे दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को प्रातःकाल तेल लगाकर अपामार्ग अर्थात चिचड़ी की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं।इस दिन शाम को यमराज के लिए दीपदान की प्रथा है।नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहते हैं। दीपावली से ठीक एक दिन पहले, दीपावली की रात्रि की भान्ति ही रात के समय उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है, यही कारण है कि इस तिथि अर्थात रात को छोटी दीपावली का नाम से जाना जाता है ।यह दिवस कार्तिक मास के लोकप्रिय पञ्चपर्व श्रृंखला के ठीक बीच में अर्थात क्रमशः धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दीवाली फिर दीपावली फिर गोधन पूजा तत्पश्चात भैया दूज नामक पर्वों के मध्य में मंत्री समुदाय के मध्य राजा की भान्ति अवस्थित होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इस तिथि का अपना विशिष्ट महात्म्य भी पौराणिक ग्रन्थों में बताया गया है ।

पौराणिक ग्रन्थों में नरक चतुर्दशी (काली चौदस) के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल-मालिश अर्थात तैलाभ्यंग करके स्नान करने का विधान बताया गया है।सनत्कुमार संहिताएवं धर्मसिंधुग्रंथ के अनुसार इससे नारकीय यातनाओं से रक्षा होती है।काली चौदस और दीपावली की रात जप-तप के लिए बहुत उत्तम मुहूर्त माना गया है। नरक चतुर्दशी की रात्रि में मंत्रजप करने से मंत्र सिद्ध होता है।इस रात्रि में सरसों के तेल अथवा घी के दीये से काजल बनाना चाहिए। इस काजल को आँखों में आँजने से किसी की बुरी नजर नहीं लगती तथा आँखों का तेज बढ़ता है।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात् दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज की पूजा व उपासना की जाती है।नरक चतुर्दशी अर्थात रूप चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान अवश्य करना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व तिल्ली के तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए, उसके बाद अपामार्ग का प्रोक्षण करना चाहिए तथा लौकी के टुकडे और अपामार्ग दोनों को अपने सिर के चारों ओर सात बार घुमाना चाहिए । ऐसा करने से नरक का भय दूर होता है। इसके साथ ही पद्मपुराण के मंत्र का पाठ करना चाहिए-

सितालोष्ठसमायुक्तं संकटकदलान्वितम। हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण: पुन: पुन:॥

अर्थात -हे तुम्बी (लौकी) हे अपामार्ग तुम बार बार फिराए जाते हुए मेरे पापों को दूर करो और मेरी कुबुद्धि का नाश कर दो।

पौराणिक विधान के अनुसार मन्त्र पाठ के पश्चात स्नान करलौकी और अपामार्ग को घर के दक्षिण दिशा में विसर्जित कर देना चाहिए। इससे रूप बढ़ता है और शरीर स्वस्थ्य रहता है। आज के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से मनुष्य नरक के भय से मुक्त हो जाता है।पद्मपुराण के अनुसार जो मनुष्य सूर्योदय से पूर्व स्नान करता है, वह यमलोक नहीं जाता है अर्थात नरक का भागी नहीं होता है।भविष्यपुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को जो व्यक्ति सूर्योदय के बाद स्नान करता है, उसके पिछले एक वर्ष के समस्त पुण्य कार्य समाप्त हो जाते हैं। इस दिन स्नान से पूर्व तिल्ली के तेल की मालिश करनी चाहिए, यद्यपि कार्तिक मास में तेल की मालिश वर्जित होती है, किन्तु नरक चतुर्दशी के दिन इसका विधान है। नरक चतुर्दशी को तिल्ली के तेल में लक्ष्मी जी तथा जल में गंगाजी का निवास होता है।

पौराणिक मान्यतानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को क्रूर कर्म करने से रोका और कृष्ण और सत्यभामा नरकासुर मर्दन कर दिया। उन्होंने सोलह हजार कन्याओं को उस दुष्ट की कैद से छुड़ाकर अपनी शरण दी और नरकासुर को यमपुरी पहुँचाया। नरकासुर प्रतीक है,वासनाओं के समूह और अहंकार का। जिस भान्तिश्रीकृष्ण ने उन कन्याओं को अपनी शरण देकर नरकासुर को यमपुरी पहुँचाया, उसी प्रकार मनुष्यों को भी अपने चित्त में विद्यमान नरकासुररूपी अहंकार और वासनाओं के समूह को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए, ताकि मनुष्य का अहं यमपुरी पहुँच जाय और मनुष्य की असंख्य वृत्तियाँ श्री कृष्ण के अधीन हो जायें। नरक चतुर्दशी पर्व का यही उद्देश्य है।इन दिनों में अंधकार में उजाला किया जाता है। मनुष्य के अपने जीवन में चाहे जितना अंधकार दिखता हो, चाहे जितना नरकासुर अर्थात् वासना और अहं का प्रभाव दिखता हो, उसे अपने आत्मकृष्ण को स्मरण कर उसकी गुण- गान करनी चाहिए । श्रीकृष्ण रुक्मिणी को आहुति देकर अर्थात् अपनी ब्रह्मविद्या को आगे करके नरकासुर को ठिकाने लगा सकेंगे ।स्त्रियों की शक्ति अर्थात मातृ शक्ति से भी यह दिवस परिचित कराताहै। नरकासुर के साथ केवल श्रीकृष्ण ही नहीं लड़े हैं बल्कि श्रीकृष्ण के साथ रुक्मिणी जी भी थीं। सोलह-सोलह हजार कन्याओं को वश में करने वाले श्रीकृष्ण को एक स्त्रीमाता रुक्मिणी ने वश में कर लिया। नारी की अदभुत शक्ति की भी याद दिलाते नजर आते हैं यहाँ श्रीकृष्ण। कतिपय पौराणिक ग्रन्थों में रुक्मिणी के स्थान पर सत्यभामा को श्रीकृष्ण के साथ नरकासुर का मर्दन करते हुए बताया गया है ।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की इस रात को दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारात सजायी जाती है।

इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक अन्य प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे, जिन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके सामने यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए राजा ने यमदूतों से कहा कि मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो? क्योंकि आपके यहाँ आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा कि एक बार आपके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है।दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे एक वर्ष का और समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहल्लत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुँचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है? ऋषियों ने उन्हें सलाह देते हुए कहा कि आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें।राजा ने ऋषियों के बताये अनुसार ही किया । इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने का बड़ा महात्मय है। स्नान के पश्चात विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

तीसरी कथा भगवान वामन व राजा बलि से सम्बन्धित है । इस पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान वामन ने त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि के बीच परम दानी दैत्यराज बलि के राज्य को तीन कदम में नाप दिया तो, बलि ने अपना पूरा राज्य भगवान विष्णु के अवतार भगवान वामन को दान कर दिया। इस पर भगवान वामन ने प्रसन्न होकर बलि से वर माँगने को कहा। बलि ने भगवान से कहा कि,  मैंने जो कुछ आपको दिया है, उसे तो मैं माँग सकता नहीं और न ही अपने लिए कुछ और माँगूँगा, लेकिन संसार के लोगों के कल्याण के लिए मैं एक वर माँगता हूँ। आपकी शक्ति है, तो दे दीजिये। इस पर भगवान वामन ने कहा, क्या वर माँगना चाहते हो राजन माँगो? यह सुन दैत्यराज बलि ने कहा कि आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली। इन तीन दिनों में प्रतिवर्ष मेरा राज्य रहना चाहिए और इन तीन दिन की अवधि में जो व्यक्ति मेरे राज्य में दीपावली मनाये उसके घर में लक्ष्मी का स्थायी निवास हो तथा जो व्यक्ति चतुर्दशी के दिन नरक के लिए दीपों का दान करेंगे, उनके सभी पितर कभी नरक में न रहें, उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए।राजा बलि की प्रार्थना सुनकर भगवान वामन बोले- मेरा वरदान है कि जो चतुर्दशी के दिन नरक के स्वामी यमराज को दीपदान करेंगे, उनके सभी पितर लोग कभी भी नरक में नहीं रहेंगे और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का उत्सव मनाएंगे, उन्हें छोड़कर मेरी प्रिय लक्ष्मी कहीं भी नहीं जायेंगी। जो इन तीन दिनों में बलि के राज में दीपावली नहीं करेंगे, उनके घर में दीपक कैसे जलेंगे? तीन दिन बलि के राज में जो मनुष्य उत्साह नहीं करते, उनके घर में सदा शोक रहे।इस कथा के अनुसार भगवान वामन द्वारा बलि को दिये इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी के व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन आरम्भ हुआ, जो आज तक चला आ रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

आपके विचार

 
 

View Comments (0)