सरकार-आरबीआई की तनातनी पर विदेश निवेशकों की राय इसके बाद आरबीआई और मजबूत हो सकता

मुंबई । मोदी सरकार और आरबीआई के बीच तनातनी से इंस्टिट्यूशंस को नुकसान पहुंचने की चिंता पैदा हो गई है, लेकिन विदेशी निवेशक इस घटनाक्रम पर अभी कोई बेचैनी नहीं दिखा रहे हैं। उनका कहना है कि यह 'रचनात्मक असहमति' है, जिससे दरअसल आरबीआई और मजबूत हो सकता है। कम से कम पांच कस्टोडियंस ने कहा कि फिलहाल विदेशी निवेशकों के बीच चिंता के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। कोई भी इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर मार्केट की नब्ज पकड़ने के लिए प्राय: कस्टोडियंस की मदद लेता है। ये विदेशी निवेशकों को डमेस्टिक सिक्योरिटीज की खरीद-फरोख्त के बारे में सलाह देते हैं। डीबीएस बैंक के आशीष वैद्य ने कहा, किसी भी रचनात्मक असहमति को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखा जाना चाहिए। मोदी सरकार की प्राथमिकता ग्रोथ है,जबकि आरबीआई की पॉलिसी मेकिंग में इन्फ्लेशन पर काबू पाना अहम है। इसकारण असहमति होना स्वाभाविक है। इसमें कोई नई बात नहीं है कि देश में इस घटनाक्रम पर विदेशी निवेशकों की नजर है। उन्होंने कहा उनके लिए दो बातें अहम हैं। एक तो रुपये की स्टेबिलिटी और दूसरी है रियल इंट्रेस्ट रेट है। वित्तीय बाजार में ऐसी अटकलें जोरों पर हैं कि प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन, बैड लोन, इंट्रेस्ट रेट से लेकर लिक्विडिटी तक कई मामलों में आरबीआई और सरकार के बीच मतभेद हैं। पिछले सप्ताह डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने आरबीआई की स्वायत्तता पर आंच आने को लेकर चेतावनी दी थी और अर्जेंटीना के फॉर्मर सेंट्रल बैंक चीफ का हवाला दिया था, जिन्होंने रिजर्व ट्रांसफर पर विवाद के चलते पद छोड़ दिया था। आचार्य ने अमेरिका और तुर्की के राष्ट्रपतियों की ओर से अपने सेंट्रल बैंकों की तीखी आलोचना का भी हवाला दिया था।पिछले कुछ दिनों में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स भारतीय डेट सिक्योरिटीज में नेट बायर रहे हैं। पिछले गुरुवार से इस सप्ताह सोमवार के बीच उन्होंने करीब 3,500 करोड़ रुपये के बॉन्ड्स में निवेश किया है। यह आंकड़ा नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी से मिला है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड के फाइनैंशल मार्केट्स हेड एम एस गोपीकृष्णन ने कहा, पिछले कुछ दिनों में सरकारी बॉन्ड्स में एफपीआई की ओर से निवेश आ रहा है। ऐसा नहीं लग रहा है कि वे आरबीआई की आजादी पर बहस से चिंतित हैं। इस महीने की शुरुआत से बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड करीब 35 बेसिस प्वाइंट्स घटा है, जिससे प्राइसेज चढ़ी हैं। क्रूड ऑयल के दाम में कमी और देश में नरम कंज्यूमर प्राइसेज के चलते सॉवरेन बॉन्ड मार्केट में रैली आ सकती है, खासतौर से यह देखते हुए कि आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में कैश डालने के लिए बॉन्ड की खरीदारी कर रहा है। 

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