फिल्म समीक्षा जंगली

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सौरभ वार्ष्णेय
हॉलिवुड के प्रमुख निर्देशक चक रसेल जो अब तक १६ फिल्म बना चुके है ऐसे में जंगली कॅरियर की पर उनकी १७ वीं फिल्म जो हिन्दी आधारित है। फिल्म जंगली जैसे की नाम से ही प्रतीत हो रहा होता है कि यह फिल्म जंगल पर ही आधारित होगी। लेकिन जंगल वाली पृष्ठभूूमि पर बनाई गई फिल्म जंगली कुछ अलग हटकर फिल्म बनाई है। इसमें एक संदेश दिया गया है कि अगर मानव जाति जानवरों की खाल व उनकी हड्डियां या हाथी के दांत से बनी चीजों का बहिष्कार किया जाता है तो कुछ हद तक नहीं बहुत हदतक जानवर तस्करी पर विराम लग सकता है। इस फिल्म के अंदर हाथी (एलीफेंट) के साथ होने वाली तस्करी को बखूबी दर्शाया गया है । हालांकि फिल्म संदेश देती है कि हमें जानवरों के साथ प्यार करना चाहिए जिससे प्राकृतिक संतुलन भी बना रहेगा। यहां एक बार और बता दें कि यह फिल्म भी हमें पुरानी हिन्दी फिल्मों की याद दिलायेगी।


कहानी का मर्म
फिल्म जंगली की कहानी शुरु होती है उड़ीसा के एक ऐसे हाथी सेंचुरी से जहां तमिल फिल्मों के मशहूर कलाकर टी विजय जो डॉ. राज नायर यानी विद्युत जामवाल के पिता का किरदार में हैं और अपनी स्वर्गवासी पत्नी के 10 साल बरशी उत्सव पर डॉ. राज नायर को उड़ी बुलाते है। ऐसे में जब डॉ राज नायर वापस जाता है तब बेवसाइट की पत्रकार मीरा (आशा भट्ट) भी उसके साथ पिता के हाथी सेंचुरी पर रिपोर्ट कवर करने के लिए राज के साथ निकलती है। राज को इस बात का पता जब चलता है जब वह बस में घर वापस जा रहा होता है और अचानक बस रुक जाती है पता चलता है कि उसकी बस का काफिला हाथी के झुंड ने रोक लिया है।

वह बस से बाहर निकलकर निडरता के साथ हाथियों के पास जाता है और एक दोस्त की तरह उनसे बातें करता है जिससे हाथी का झुंड वहां से चला जाता है। तभी उसकी नजर पत्रकार पर पढ़ती है। कहानी आगे बढ़ती है डॉ राज नायर अपने घर पहुंच जाता है जहां उसकी अपने पिता के साथ नोंकझोंक होती है और वह धीरे -धीरे जब राज के पिता उसे बताते है कि उसकी मां को कैंसर था और वह सेंचुरी को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी जिस पर राज का गुस्सा कुछ हदतक ठंडा होता है। कहानी में प्यार का एंगल भी दिखाया है जहां राज के घर पर उसके पिता के साथ सेंचुरी को उसकी बचपन की साथी महावत शंकरा ( पूजा सावंत) का छुपा हुआ प्यार है क्योंकि शंकरा बिना राज के शादी नहीं करती है इसमें वनधिकारी के रूप में बचपन का मित्र देव भी है। वहीं डॉ. राज नायर के गुरु (मकरंद देशपांडे ) ने अच्छा किरदार निभाया है। आगे कहानी में अतुल कुलकर्णी जो एक शिकारी का किरदार निभा रहे हैं जो कि एक विदेशी द्वारा हाथी के लम्बे दांत देखकर उसकी डिमांड करता है। जिसे कुलकर्णी पूरा करने के लिए सेंचुरी की ओर चल देता है। जहां डॉ राज नायर पुरानी यादें ताजा करते हुए हाथियों के साथ जो प्यार होता है उसे बखूबी निर्देशक ने एक तस्वीर में उकेरते हुए ऐ ऐसा माहौल बना दिया है जहां एक हथिनी (दीदी) ने और एक हाथी (भोला)ने समा बांधते हुए दर्शकों के पैसे बसूल करा दिए है। ऐसे में जहां एक ओर डॉ राज नायर की मां की दसवीं वरशी का उत्सव समापन होता है वहा अतुल कुलकर्णी हाथी का शिकार करने के लिए चल देता है जहां हथिनी (दीदी) ने चिंघाडती है और शिकारी की ओर चल देती है उसकी आवाज सुनकर टी विजय की नींद खुल जाती है ओर वह दीदी का पीछा करते हुए जंगल पहुंचता है जहां उसकी नजर हाथी पर पड़ती है जो कि शिकार के कारण मृत हो जाता है। ऐसे में टी विजय को शिकारी गोली मार देता है जिससे उनकी मौके पर मौत हो जाती है। यहां से डॉ राज नायर चक्रव्युह में फंस जाता है। आखिरकार इस चक्रव्युह को डॉ राज नायर कैसे तोड़ता है शंकरा उसे मिलती है कि नही इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी। क्योंकि फिल्म जिस बखूबी के साथ बनाई गई है उसे लिखपाना संभव नहीं है। ऐसी फिल्में जानवरों के प्रति प्यार को बढ़ावा देती हैं और इनसे हमें जंगल में होने वाली गतिविधियों का भी पता चलता है।

गीत संगीत
इस फिल्म में कुल तीन गाने है जिन्हें हाथी के साथ फिल्माया गया है।

निर्देशित : चक रसेल द्वारा
निर्माता: विनीत जैन, प्रीति शाहनी
्रलेखक: अक्षत घिल्डियाल, सुमन पालन
पटकथा: एडम प्रिंस
कहानीकार: रोहन सिप्पी, चारुदत्त आचार्य, उमेश पाडलकर
रितेश शाह
कलाकारगण: डॉ राज नायर (विद्युत जामवाल) शंकरा (पूजा सावंत, आशा भट, अतुल कुलकर्णी, अक्षय ओबेरॉय, टी विजय
गीत एवं संगीत
समीर उद्दीन
उत्पादन कंपनी: एए फिल्म्स
रिलीज : 29 मार्च 2019
अवधि : ११५ मिनट
देश : भारत
भाषा : हिन्दी

 

 

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