अपरूपण जोनों में स्थानीयकृत दबाव और आंशिक गलाव हिमालय के कुमाऊं क्षेत्र में भूकंपीयता को नियंत्रित कर सकते हैं

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नई दिल्ली। श्रीजी एक्सप्रेस
हिमालय क्षेत्र में भूकंपीय एवं भूस्खलन घटनाओं पर अधिकांश अनुसंधान भूभौतिकी एवं भू-आकृतिक अभिलक्षणों पर फोकस करते हैं। तथापि, कई घटनाओं में इन प्राकृतिक आपदाओं के अंतर्निहित कारण गहरे उपसतह में छुपे हुए हो सकते हैं और उनके चट्टान प्रकार, रियोलोजी, दबाव स्थानीयकरण आदि जैसे भूगर्भीय पहलू भी हो सकते हैं। इसलिए, हिमालय के अपरोक्त खंड के भूगतिक परिदृश्य को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना इसके बाद के प्राकृतिक आपदाओं के भूकंपीय और भू-आकृति अभिलक्षणों को समझना।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्तशासी संस्थान देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि कुमाऊं में पश्चिमी हिमालय के अन्य हिस्सों के विपरीत परत का आंशिक गलन चट्टानों से निर्मित्त प्लानर या कर्वी-प्लानर जोन जैसी शीट की सारिणीबद्ध सक्रियता के कारण होता है जो मध्य-क्रस्टल आंशिक गलनों के निरंतर जोन के बजाये जोन (प्रमुख शीयर जोन) के निकटस्थ चट्टानों से कहीं अधिक तनावपूर्ण होते हैं। इस अध्ययन से यह भी संकेत मिलता है कि इन शीयर जोनों/थ्रस्ट प्लेन का नाजुक विरूपण अभी भी हिमालय के इस क्षेत्र में उत्खनन और भूकंपीयता को नियंत्रित कर सकता है।
वैज्ञानिक जर्नल ‘लिथोस’ में प्रकाशित अनुसंधान इनवर्टेड मेटामोर्फिज्म ( वह स्थिति जिसमें उच्चतर ग्रेड के मेटामोर्फिक चट्टान निम्न ग्रेड के चट्टानों के शीर्ष पर झुके रहते हैं) प्रदर्शित करता है जिससे 27 से 32 एवं 22 से 26 मिलियन वर्षों के दो लघु समय अवधि में हिमालयी परत का आंशिक गलन हुआ है।
यह अध्ययन हाल के अध्ययनों से सहमति व्यक्त करता है जिसमें इंगित किया गया है कि एक समान तंत्र हिमालयी मेटामोर्फिक कोर के उद्भव की व्याख्या नहीं कर सकता है।
विभिन्न थ्रस्टों की सक्रियता एवं विभिन्न तंत्र इस पर्वतन के विभिन्न खंडों में प्रचालन कर सकते हैं जिसमें वाहिका प्रवाह परिक्षेत्र और मुलायम क्षेत्र में प्रबल है।
दूसरी तरफ, महत्वपूर्ण शंकु या वेज के प्रकार के एक्सट्रूजन तथा थ्रस्ट शीटां का आगे की ओर संचरण, उच्च अंतरीप या मुलायम क्षेत्र में अधिक सुस्पष्ट है। यह भी प्रदर्शित किया गया है कि वाहिका प्रवाह का प्रभाव हिमालय के विभिन्न खंडों में पूरी तरह अनुपस्थित है। इसलिए, विभिन्न ट्रांसेक्टों के उत्खनन, थ्रस्ट गतिविधि के विभिन्न तंत्र और इसलिए भूकंपीय और अपरदनजन्य अभिलक्षण हो सकते हैं।
कुमाऊं की काली नदी घाटी भारत और नेपाल के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा को चिन्हित करती है। इस क्षेत्र में सघन भूकंपीय और भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। वैज्ञानिकों ने काली नदी घाटी के सुदूर उच्चतर भागों में समेकित प्रक्षेत्र, मेटामौर्फिक मोडेलिंग एवं जियोक्रोनोलाजिकल जांच की है और किसी ‘वाहिका प्रवाह’ या आंशिक गलन का किसी क्षेत्रीय स्तर के मिड-क्रस्टल जोन का अभाव पाया है। वाहिका प्रवाह तंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण पूर्व शर्त आंशिक गलन ( कम से कम 20 से 30 मिलियन वर्ष) की दीर्घ अवधि है।
इस अध्ययन ने मैगमैटिज्म के लघु एवं विशिष्ट मिजाजों को दर्शाया है जो विशिष्ट शीयर जोन के साथ दबाव स्थानीयकरण एवं विरूपण की घटनाओं का संकेत देता है। ये शीयर जोन, बाद में मुलायम क्षेत्र ने नए शीयर जोन या थ्रस्टों के निर्माण के साथ उत्खनन को नियंत्रित किया जिससे हिमालयी कोर के विस्तार और उत्खनन में सहायता मिली। जियोलोजिकल प्रोक्सी के आधार पर इन थ्रस्ट जोनों की पहचान भूकंपीयता और यहां तक कि भूस्खलनों के जोनों के निर्धारण में सहायता करती हैं, क्योंकि थ्रस्ट या फाल्ट जोन में उपस्थित अत्यधिक तनावपूर्ण एवं कंकड़ी स्लोप विफलता के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।

post by tisha varshney

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