मध्य प्रदेश की मुरेना सीट पर दलबदलुओं की खासी नजर

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आदर्श गुप्ता वरिष्ठ पत्रकार की कलम से
मुरैना(श्रीजी एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क)। मुरैना लोकसभा सीट पर कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित न होने के कारण दलबदलुओं की बहार आई हुई है दलबदलुओं की बदहाली के कई प्रत्यक्ष उदाहरण मौजूद होने के बाद भी लोग दलबदल पर उतरे हुए हैं। इस सीट के टिकट के लिए कांग्रेसियों ने देव दनुज धर मनुज शरीरा बिपुल वीर बैठे रनधीरा “बाली हालत बना रखी थी अब दलबदल कर भाजपा से कांग्रेस में आने बालों ने हालत और खराब कर दी है दलबदलने को आतुर दो नाम इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है भिंड सीट के लिए अशोक अर्गल और मुरेना के लिए अनूप मिश्रा ये दोनों महानुभाव भाजपा के पुराने कर्मठ कार्यकर्ता और नेता रहे है ।

पिछले कुछ सालों में दलबदल करने बाले नेताओ और उनके हालात का जायजा यह समझने को लें कि क्या दलबदल से उंन्हे कोई फायदा हुआ ?इस की शुरुआत बालेंदु शुक्ला से करते है कभी कांग्रेसी रहे बालेंदु शुक्ल आज भाजपा में है यह लिखना पड़ता है अन्यथा भाजपा के किसी मंच पर उनका नाम कभी सुनाई नही देता इस गुमनामी को उन्होंने खुद चुना इस गुमान में चुना कि कांग्रेस उनके नाम से जानी जाती है 1984 में जब स्व माधवराव सिंधिया कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुए तो चम्बल की उनकी राजनीति को तीन लोग चलाते थे महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा,शिवप्रताप सिंह और बालेंदु शुक्ल इनमे बालेंदु शुक्ल का कद ज्यादा बड़ा था क्योंकि श्री सिंधिया उंन्हे अपना बाल सखा कह कर सम्मान देते थे तब चम्बल ग्वालियर सम्भाग में बालेंदु शुक्ल की तूती बोलती थी ।असलियत का तो पता नही लेकिन सिंधिया परिवार से उनके मनमुटाव हुए और उन्होंने उस कांग्रेस को छोड़ दिया जिसने उन्हें एक बैंक कर्मी से राज्य में कैबिनेट मंत्री बनाया ।

आज कहां है बालेंदु शुक्ल ?उनका जिक्र इस लिए किया क्योंकि मुरेना के ब्राह्मण समाज के कुछ लोगों ने उन्हें मुरेना से लोकसभा का टिकट दिए जाने की मांग भाजपा के सामने रखी थी सम्भावनाओ के आकलन के लिए उनका मुरैना का दौरा भी कराया गया था लेकिन पार्टी ने कोई भाव नही दिया ।
इस लिस्ट का दूसरा नाम भिंड के राकेश चौधरी का है कांग्रेस ने उन्हें क्या नही दिया लेकिन उन्होंने पार्टी को विधानसभा में रुसवा किया किस हासिल के लिए भाजपा में जाकर उन्हें क्या ऐसा मिल गया जो कांग्रेस में नही मिल रहा था उल्टे उनका नाम गुमनामी के अंधेरे में खो गया । एक और नाम परसराम मुद्गल का लिया जा सकता है बसपा से विधायक बने और फिर अपने स्वार्थ से भाजपा में आये मुद्गल को भाजपा ने विधायक का टिकट भी नही दिया कहां वे मंत्री बनने के ख्वाब देख रहे थे निराश श्री मुद्गल विधानसभा के टिकट के लिए फिर से बसपा और कांग्रेस की शरण में भी गए लेकिन किसी ने भाव नही दिया बताते है कि इस लोकसभा चुनाव के टिकट के लिए भी उन्होंने सभी पार्टियों के सभी नेताओं की खूब गणेश परिक्रमा की लेकिन कुछ नही हुआ ।
और सबसे ताजा उदाहरण भगीरथ प्रसाद का 2014 में भिंड से कांग्रेस ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया था नामांकन के आखिरी समय में उन्होंने कांग्रेस का टिकट फेंक कर भाजपा की गोद में बैठना पसन्द किया जीत भी गए संसद भी पहुंच गए लेकिन 2019 आया तो उसी भाजपा ने उन्हें फेंक दिया पार्टी ने उनकी जगह संध्या राय को टिकट दे दिया अब भगीरथ प्रसाद फिर कांग्रेस की शरण में जाना चाहते है।


दलबदलुओं के इन उदाहरणो की रोशनी में सबसे पहले अनूप मिश्रा को परखें ।अनूप मिश्रा को राजनीति में अटल बिहारी बाजपेयी के भांजे के तौर पर जाना पहचाना जाता है 1990 से पार्टी उंन्हे गवालियर से विधायक के 4 चुनाव लड़ा चुकी है 2013 में कैबिनेट मंत्री बना चुकी है 2014 में मुरेना से उंन्हे सांसद बना चुकी है 2018 में उनकी जिद पर उंन्हे ग्वालियर से विधायक का चुनाव लड़ा चुकी है जो वे हार गए अब 2019 में पार्टी ने उन्हें संसद भेजने से मना कर दिया तो कायदे से उंन्हे अपनी पार्टी के फैसले को मानना था लेकिन उन्होंने बगावत करना ज्यादा ठीक समझा उनकी कांग्रेस में जाने और मुरेना सीट से ही लड़ने की संभावना जताई जा रही है सबाल यह है कि कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओ का क्या होगा ?उनमें से कई चुनाव लड़ने के दावेदार हैं ।


दूसरे भजपाई हैं अशोक अर्गल जो बगावत पर आमादा है और कांग्रेस से भिंड लोकसभा के टिकट की जुगाड़ में हैं अर्गल के पिता छविराम अर्गल ने 1967 में दिमनी से निर्दलीय के तौर पर पहला चुनाव लड़ा था 1972 में वे जनसंघ से दिमनी से विधायक बने 1977 में मुरेना से सांसद बने तबसे लेकर 1991 तक पार्टी उंन्हे चुनाव लड़ाती रही दुर्घटना में मृत्यु के बाद 1996 में पार्टी ने उनके पुत्र अशोक अर्गल को उत्तराधिकार सौंपा जो 2004 के चुनाव तक चला 2009 में मुरेना सामान्य सीट हो गई तो संसद में नोटकाण्ड के पुरस्कार के तौर पर पार्टी ने उन्हें भिंड से चुनाव लड़ा कर सांसद बनाया ।2014 में सांसद का टिकट नही दिया लेकिन मुरेना नगर निगम का महापौर बनाया ।46 साल से पार्टी उंनके परिवार को निरन्तर सत्ता में बनाये हुए है अब 2019 में उसने उंन्हे भिंड से टिकट देने से मना करके सध्या राय को मौका दिया तो अशोक अर्गल बगावत पर उतर आए इससे ज्यादा अहसान फरामोशी क्या होगी ।


क्या इन दोनो का कांग्रेस में कोई भविष्य है या वहां इनकी कोई संभावना है इसका आसान सा जबाब है नही इनकी कांग्रेस में आने की कोई संभावना नही है जो भी अफवाहें हैं वे इनकी तरफ से ही अपनी पार्टी को ब्लैकमेल करने के लिए फैलाई गई हैं चम्बल के टिकट सिंधिया खेमे को तय करने हैं और वहां सिर्फ कट्टर वफादार को ही भाव मिलता है ।
थोड़ा लिखा बहुत समझें ।

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