फिल्म समीक्षा गॉन केश

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सौरभ वार्ष्णेय
गॉन केश हल्की फुल्की मनोरंजक वाली भारतीय सिनेमाई की अलग हटकर पेशकश है। इस फिल्म के निर्माता धीरज घोष व निर्देशन कासिम खालो ने किया है। गॉन केश एक ऐसी फिल्म है जिससे एक तवका जो अपने आप को ऐसा महसूस करता है कि ईश्वर ने उसे ही क्यों इतनी तकलीफों से भरा बनाया है तब ऐसे परेशानी से घिरे लोगों को गॉनकेश जरूर प्रेरक बनायेगी क्योंकि इसका असली मकसद ही यही है कि इस फिल्म से प्रेरित होते हुए अपने अपनी बीमारियों से जूझते हुए अंदर छिपी हुई प्रतिभा को निखार सकें। इसके लिए फिल्म निर्देशन कासिम खालो को मैं हिन्दी सिनेमा में दिए जाने वाले ५ अंकों में ५ दूंगा क्योंकि उनकी रचित फिल्म में कहीं भी दर्शक को यह महसूस नहीं होने दिया गया कि यह कहानी भी उससे अलग है। इससे दर्शकों में भी एक नई सोच पैदा करती है और इन्हीं सोच से समाज और देश आगे बढ़ता है।


कहानी
बात करते है कि फिल्म की कहानी की तो यह सिलीगुढ़ी के शहर में स्थित एक ऐसे मध्यम परिवार की कहानी है जिसमें एक युवति बचपन से लेकर प्रौढ़ता तक एलोपेशियां नामक बीमारी (इस बीमारी में बाल ऐसे झड़ते है जिसमें गंजापन हो जाता है) ऐसे में जब ऐसी बीमारी से ग्रसित युवति शादी योग्य हो जाती है तो उसकी शादी भी बहुत कठिन हो जाती है। ऐसे में ऐसी युवति को अपने केश की वजह से किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस युवती का नाम है इनाक्षी दास गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) जो एक स्कूल से ही नृत्य की महत्वाकांक्षा रखती है। लेकिन एक अच्छी नृत्यांगना बनने में रुकावट बनता है उसके उसके सिर के बॉलों का झड़ना(एलोपेशिया)। इन संघर्षों से जूझती हुई फिल्म कुछ पीछे चली जाती है जहां इनाक्षी दास गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) को स्कूली छात्रा के रूप में चित्रित किया है वह काफिलेतारीफ है क्योंकि स्कूली छात्रा के रूप में भी दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ेगी। इसके बाद फिल्म फिर से सामातंर चलने लगती है जहां आखिरकार वह अपनी मंजिल पाने में कामयाब हो जाती है। इस फिल्म में इनाक्षी दास गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) के पिता के किरदार में विपिन शर्मा और मां का किरदार दीपिका अमीन ने निभाया है। इन दोनों ने बखूबी ऐसे माता-पिता का किरदार निभाया है जो स्वयं अपने सपने को दबाते हुए बच्चों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। इसके साथ अपनी वाक्य शैली के लिए परिचित बृजेन्द्र काला सहित अन्य कलाकर सहायक भूमिकाओं में अपनी अदाकारी करते हुए दिखाई देंगे। वहीं नवेदिता कलाकार जितेंद्र को भी खूब वाह वाही मिलेगी क्योंकि उनकी नर्वस में दर्शकों को भी खूब भाया है यहां पूरा वर्णन करना ठीक नहीं क्योंकि कुछ ऐसी चीज होती हैं जिसे देखने से अधिक अनुभूति होती है इसलिए दर्शकों के लिए यह फिल्म एक आदर्श बनेगी। दर्शकों को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

हास्यपद व गंभीर
फिल्म की बात की जाये तो इसमें संवाद भी अच्छे हैं जिन्हें आम बोलचाल में एक साधारण परिवार में आम रूप से बोला जाता है। कहीं भी ऐसा महसूस नहीं किया जहां मन ऊबा हो आंखों में आंसू तो तब आते है जब लड़का भी इनाक्षी दास गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) को उसके असली रूप में देखता है एक बारगी जब दर्शकों को लगेगा….. तब लड़के की हां सुनकर वाह-वाही हो जाती है।
संगीत-सगीतकार
पूरी फिल्म में ५ गाने है जिन्हें फिल्म में अच्छी तरह से फिल्माया गया है। बीबी, दिल ढ़ूंढता है, मैं उड़ी, बेईमानी से तथा नुस्खा तराना है।

निर्देशित : कासिम खलो
निर्मता : धीरज घोष
कलाकार गण : श्वेता त्रिपाठी, जितेंद्र कुमार, विपिन शर्मा, दीपिका अमीन, बृजेंद्र काला आदि
संगीत : कनिष्क शर्मा, बैशाख ज्योति
छायांकन अभि डांगे
आशुतोष मटेला द्वारा संपादित
उत्पादक कंपनी : धीरेंद्र नाथ घोष फिल्म्स
वितरक : इरोस इंटरनेशनल
रिलीज़ : 29 मार्च 2019
भाषा हिन्दी
समय अवधि : एक घंटा ५० मिनट
रेटिंग : ५

 

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