हाल-ए-शिक्षा : प्राइवेट स्कूलों की मनमानी अभिभावकों पर पड़ रही भारी

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शीबू खान
 हर वर्ष कोर्स बदलना बना मुसीबत
 फीस के नाम अभिभावको का हो रहा शोषण
फतेहपुर। केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा जहां शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के लिए स्कूल चलो अभियान चलाया जा रहा है वहीं बालिकाओं की शिक्षा के लिए बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा देकर उन्हें शिक्षा मुहैया कराए जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हर अभिभावक का सपना अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाना होता है लेकिन प्राइवेट स्कूलों की मनमानी के आगे अभिभावक अपने सपनों के बोझ तले दबकर रह गए हैं। बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए अभिभावक उन्हें कनवेंट स्कूल भेजकर समय के साथ चलने के काबिल बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। वही प्राइवेट कान्वेंट स्कूलो की मनमानी फीस और कापी-किताब के दामों के बोझ तले उनके अरमान दब से गए हैं। हताश अभिभावक अपने बच्चों कि बेहतर शिक्षा की खातिर तो कह तो कुछ नहीं पा रहे हैं लेकिन शिक्षा के बोझ को वहन करने में अपने आप को असहाय सा पा रहे हैं। कहने को तो शहर में सीबीएसई, आईसीएसई, सीआईएसई, यूपी बोर्ड, मदरसा बोर्ड, संस्कृत बोर्ड समेत अन्य अन्य बोर्डों के बहुतायत स्कूल चल रहे हैं लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को जमाने के साथ चलने वाली सबसे अच्छी से शिक्षा दिलाने की चाह रखते है। जिसके लिए वह उन्हें कन्वेंट स्कूल भेज कर शिक्षा दिलाने का सपना संजो रहे हैं। लेकिन शिक्षा विभाग के अफसरों व शासन-प्रशासन के उच्च पदों पर आसीन जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण निजी विद्यालय बेलगाम से हो गए हैं। एक तरफ स्कूल प्रशासन मनमानी फीस लेने पर उतारू है जबकि दूसरी ओर मोटी आय कमाने के लालच में स्कूल कॉपी किताब की दुकानों में तब्दील होकर रह गए हैं और अभिभावक अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की खातिर ऊंचे दामों पर खरीदने को मजबूर है। हाल तो यह है कि निजी स्कूलों में रिजल्ट वितरण वाले दिन ही बच्चों को कापी किताबों की लिस्ट पकड़ा दी जाती है और उन्हें विद्यालय परिसर में बनाई गई दुकानों अथवा स्कूल की ओर से चिन्हित दुकानो से मनमाने दाम में खरीदने के लिए विवश किया जाता है। कुछ विद्यालय द्वारा खास किस्म की कंपनियों की कॉपियां तक खरीदने की बाध्यता रखी जाती है। स्कूलो में प्रवेश शुल्क सहित कई तरह के अन्य शुल्क लागू कर अभिभावकों की जेबो पर डाका डालने का काम किया जा रहा है। स्कूल प्रशासन द्वारा स्कूल बंद रहने के दौरान मई व जून माह की फीस एवं ट्रांसपोर्ट खर्च तक के पैसे वसूले जा रहे है। जबकि प्रदेश में सरकार बनते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा निजी स्कूलों और कॉन्वेंट विद्यालयों द्वारा अभिभावकों की जेब ढीली करने पर रूख अपनाया गया था। जिलों में अभिभावक संघ, जिला प्रशासन एवं स्कूल प्रबन्धन के माध्यम से अभिभावकों को राहत दिलाने की कोशिश की गयी थी लेकिन इस वर्ष नया शिक्षा सत्र शुरू हो चुका है जिला प्रशासन व अभिभावक संघ निष्क्रिय दिखाई दे रहा है। जिससे प्राइवेट स्कूलों की मनमानी अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। बेलगाम हो चुके निजी विद्यालयो द्वारा हर वर्ष न केवल प्रकाशक बदल कर दूसरी किताबे लागू कर दी जाती है। जिससे गरीब अभिभावक अपने ही एक कक्षा आगे पढ़ने वाले बच्चे की किताबे तक उपयोग में नहीं ला सकते। जबकि शासन द्वारा अभिभावकों की समस्याओं को देखते हुए कानवेंट एवं प्राइवेट स्कूलों में एनसीईआरटी पैटर्न की पुस्तकों को लागू किए जाने के लिये निर्देशित किया गया था। लेकिन शिक्षा विभाग की लापरवाही से शासन का यह आदेश भी हवा हवाई बनकर रह गया है। निजी विद्यालय प्रशासन द्वारा न केवल मनमाने राइटर एवं प्रकाशकों की किताबों को लागू की जा रही है बल्कि उनके रेट भी मनमाने रखे जा रहे है। सरकार का आदेश भले ही स्कूलो को कॉपी-किताबे बेचने से रोकता हो लेकिन जनपद में शायद ही ऐसा कोई बड़ा या छोटा स्कूल हो जो अपनी किताबे व कापियां खुद न बेच रहा हो। स्कूलो द्वारा इसके लिए पहले से ही बाकायदा तैयारी की जाती है मोटा कमीशन देने वाले प्रकाशकों को तैयार कर उनसे किताबे व कापियां छपवा कर विद्यालय से ही उन्हें अभिभावको को मनमाने दामो पर बेचा जाता है। मजेदार बात यह की इन किताबो व कापियों का न तो अभिभावकों को रजिस्टर्ड बिल मिलता है और न ही सरकार को राजस्व। हलाकि स्कूलो के इस गोरखधंधों में शामिल शिक्षा विभाग के अफसर जरूर मालामाल हो रहे है।
अफसरों की नाक के नीचे होता खेल
फतेहपुर। प्राइवेट एवं कन्वेंट स्कूल द्वारा किए जा रहे इस खेल में शिक्षा विभाग के अफसर भी बराबर के जिम्मेदार हैं। विद्यालय प्रबंध तंत्र द्वारा न केवल खुलेआम स्कूल परिसर से ही मनमाने दामो पर किताबों एवं कापियों की बिक्री की जा रही है। शिक्षा विभाग के अफसरो पर स्कूलो की निगरानी की जिम्मेदारी होती है उसे निभाने की जगह जिम्मेदार स्कूल प्रशासन से सम्बन्ध निभाने में लग जाते है।
रिजल्ट कार्ड वितरण के दिन से ही शुरू होती उगाही
 निजी स्कूल प्रशासन द्वारा बच्चों व उनके अभिभावकों को कॉपी किताबो की सूची रिजल्ट वितरण के साथ ही थमाकर उनको विद्यालय परिसर स्थित दुकान या फिर चिन्हित संस्थानों का नाम बताकर किताबे लेने को मजबूर किया जाता है। वही अभिभावको का कहना है कि स्कूलों द्वारा बताई गयी दुकान की जगह अन्य संस्थानों पर किताबे मिलती ही नही जिस कारण अमुक दुकानो से खरीदना मजबूरी है। साथ ही अभिभावको को इस बात का भी डर होता है कि अफसरो से शिकायत करने पर उनके बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए। शायद यह एक बड़ी वजह है जिससे अभिभावक सब कुछ जानते हुए भी अपना शोषण सहने को मजबूर हो रहे हैं। दुकानदारों द्वारा स्कूलो के नाम पर हर कक्षा के हिसाब से किताब-कॉपी, कवर रोल, पेन्सिल कम्पास, ड्राइंग की कॉपी, मैप समेत सभी तरह की स्टेशनरी का सेट बना कर तैयार रखे जाते है। स्कूल व कक्षा का नाम बताने मात्र पर तुरन्त बंधा हुआ पैकेट पकड़ा दिया जाता है।
हर वर्ष कोर्स बदलने से बढ़ता बोझ
 कान्वेंट व निजी स्कूलों द्वारा हर वर्ष कोर्स बदलने से जहाँ अभिभावक अपने बड़े बच्चो की किताबें दोबारा प्रयोग में नही ला पाते है। वही निजी प्रकाशकों की किताबो व कापियों के मनमाने ढंग से दाम बढ़ाने पर कोई लगाम न होने से अभिभावको को कई गुना तक अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है।
आंखे मूंदकर चैन की नींद सो रहे जिम्मेदार
 शहर की तीनों तहसीलों में सभी बोर्डों को मिलाकर मान्यता व गैरमान्यता प्राप्त हजारो विद्यालय चल रहे है। मनमानी फीस व सिलेबस की के नाम पर की जा रही लूट खसोट जारी है। निजी स्कूल प्रबन्ध तंत्र द्वारा मनमानी शुल्क व्रद्धि व कॉपी किताबो का भारी भरकम खर्च बढ़ने के पीछे मंहगाई मेंटिनेंस व स्टाफ खर्च बढ़ने की दुहाई दी जाती है जबकि इसके लिये केवल मंहगाई ही जिम्मेदार नही है। बल्कि प्रबन्ध तंत्र का अधिक धन अर्जित करना भी है। स्कूलों की मनमानी पर नजर रखने के लिये शासन द्वारा जिम्मेदारों की टीम निर्धारित है लेकिन रक्षक के ही भक्षक व हिस्सेदार बन जाने से निजी विद्यालय बेलगाम से होकर रह गए है। एक ओर संस्थान मनमानी फीस वसूलने पर उतारू है तो दूसरी तरफ अभिभावक मनमाने दामो पर किताबे खरीदने पर मजबूर जबकि जिम्मेदार अपनी आँखों को मूंदकर चैन की नींद सोने में मस्त है।

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