स्थानीय प्रत्याशी की मांग से पार्टियां मुश्किल में

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मुरेना(मध्य प्रदेश)।
आदर्श गुप्ता
मरेना से चुनाव लड़ने वाली दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के सामने जीतने योग्य प्रत्याशी को चुनना एक बडी समस्या हैं ।दोनो पार्टियां कई तरह के सर्वे कर चुकी है लेकिन सर्वे से ऐसा कोई नाम सामने नही आया जो चुनाव जीत सके । ऊपर से वोटरों और कार्यकर्ताओं द्वारा की जा रही       स्थानीय प्रत्याशी की मांग ने इन पार्टियों की मुसीबत और बढ़ा दी है ।स्थानीय प्रत्याशी के मुद्दे को भाजपा और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ज्यादा तूल दे रखा है जबकि इस युद्ध की तीसरी पार्टी बसपा पहले ही भिंड के रहने बाले पूर्व सासंद डॉ रामलखन सिंह को इस सीट से लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर चुकी है ।यहां 12 मई को वोट पड़ने हैं ।

मुरेना लोकसभा में श्योपुर जिला भी शामिल है पहले यह एक ही जिला था श्योपुर इसकी तहसील थी 1990 में मुरेना को विभाजित करके श्योपुर अलग जिला बना दिया गया इसीसे इसे मुरेना श्योपुर लोकसभा क्षेत्र कहते हैं । 2009 से पहले यह सीट अनुसूचित जाति के लिए असरक्षित थी 2009 के परिसीमन में इसे सामान्य घोषित किया गया।इसके बाद सवर्णों के मैदान में आने से यहां चुनाव की सही रंगत दिखाई देने लगी है । पहला 2009 के चुनाव में भाजपा ग्वालियर से नरेंद्र सिंह तोमर को लाई थी तो कांग्रेस श्योपुर से रामनिवास रावत को लाई थी ।2014 में भाजपा फिर ग्वालियर से अनूप मिश्रा को ले आई तो कांग्रेस भिंड से डॉ गोविंद सिंह को ले आई ।अब इस बार इन बाहरी प्रत्याशियों को लेकर दोनो पार्टियों में असंतोष है।
कार्यकर्ताओं को आगे करके स्थानीयता का मुद्दा उन स्थानीय नेताओं
ने उछाला है जो इन बड़े बाहरी नामों की बजह से हमेशा चुनाव लड़ने बंचित कर दिए जाते हैं भाजपा में ऐसे कई नाम है इस बार सुमावली से दो बार विधायक रह चुके गजराज सिंह सिकरवार लोकसभा के दावेदार है उनकी सीनियरिटी की अनदेखी करके ग्वालियर की क्षात्र राजनीति में उनके चेले रहे नरेंद्र सिंह तोमर को पार्टी मुरेना से सांसद और राज्य और केंद्र दोनो जगह मंत्री बना चुकी है। अनूप मिश्रा का मामला तो और भी अजीब है अटल विहारी बाजपेयी के भांजे होने के नाते उंन्हे पार्टी ग्वालियर से विधानसभा का चुनाव लड़ाती रही राज्य में मंत्री बनाती रही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी नजर थी इसलिए शिवराज सिंह ने उन्हें बहाने से मंत्रिमंडल से हटाया तो फिर दुबारा लिया नही ।पार्टी ने उन्हें मुरेना से सांसद बना दिया उनका उसमें मन नही लगा 5 साल वे ग्वालियर की राजनीति करते रहे और2018 के विधानसभा चुनाव में टिकट को अड़ गए ताकि जीत कर भाजपा की सरकार में मंत्री बन सकें मजबूरन पार्टी को उंन्हे ग्वालियर से टिकट देना पड़ा यह चुनाव वे हार गए प्रदेश में भाजपा की सरकार भी नही बनी अब पार्टी उंन्हे या फिर नरेंद्र सिंह को मुरेना से सांसद का चुनाव लड़ाना चाहती है लोगों को इन दोनों पर आपत्ति है वे गजराज सिंह के लिए टिकट मांग रहे है । टिकट की लाइन में और भी बहुत लोग लगे हैं लेकिन इनमे से गजराज सिंह की दावेदारी थोड़ी बजन दार है।
कांग्रेस में बाहरी का मुद्दा नही है 2009 में सिंधिया खेमे के जिन रामनिवास रावत को पार्टी ने मैदान में उतारा था वे अविभाजित मुरेना जिले की विजयपुर विधानसभा से विधायक चुने जाते रहे है राज्य सरकार में मंत्री भी मुरेना कोटे से रह चुके हैं उनके सामने समस्या यह थी कि विजयपुर से बाहर बाकी जिले में उनका कोई आधार नही था उंन्हे कोई जानता पहचानता भी नही था इसी लिए वे नरेंद्र सिंह तोमर से उनके तोमर घार में बुरी तरह हार गए थे इस बार भी कांग्रेस का टिकट उंन्हे ही मिलने की सम्भावना जताई जा रही है जबकि इस बार2018 में तो वे विजयपुर से विधायक का चुनाव भी हार गए हैं कांग्रेस में स्थानीय प्रत्याशियों की बाढ़ आई हुई है लेकिन इनमे वैश्य वर्ग के दो नाम के एस आइल्स के चेयरमैन रमेश गर्ग और डॉ राकेश माहेश्वरी की दावेदारी सबसे मजबूत है इनके चेहरे दोनो जिलों में जाने पहचाने हैं ।कांग्रेस में गुटबाजी बड़ी समस्या है रामनिवास रावत सिंधिया खेमें से आते है ।2014 में लड़े डॉ गोविंद सिंह दिग्विजय सिंह के खेमेमें हैं मुख्यमंत्री कमलनाथ का भी खेमा यहां अस्तित्व में है इन तीनो खेमों का एक साझा प्रत्याशी खोजना मुश्किल है नतीजे में प्रत्याशी सिंधिया खेमे के ही होगा बाकी दोनो खेमे के लोग उसे हराने की पूरी कोशिश करेगे ।
बसपा 2014 के लोकसभा चुनाव में दूसरे नम्बर पर रही थी उसके यहां स्थानीय बाहरी प्रत्याशी का कोई मुद्दा नही होता चंदे में मोटी रकम देकर आखिरी दिन तक कोई भी टिकट ले आता है उनका वोट बैंक हाथी चिन्ह को वोट देता है प्रत्याशी से उसे मतलब नही होता लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में इस बार यह ट्रेंड बदल गया इस बार बसपा के वोटर ने कांग्रेस को वोट किया था लोकसभा में भी यही चलन रहेगा इसलिए उसका कौन प्रत्याशी है कहाँ का है कोई मानी नही रखता ।
मुरेना श्योपुर लोकसभा क्षेत्र देश के सबसे बड़े चुनाव क्षेत्रों में से है मध्यप्रदेश में क्षेत्रफल के हिसाब से आज भी सबसे बड़ा लगभग 350 किमी लम्बा चुनाव क्षेत्र हैं इसमें 8 विधान सभा क्षेत्र है 2 श्योपुर के और 6 मुरेना के हैं ।इतने बड़े इलाके में सबका जाना पहचाना एक नाम खोजना कठिन काम है ।2004 तक के चुनाव में सुरक्षित सीट होने के कारण यहां से जिसे पार्टी टिकट दे देती थी लोग उसे जिता देते थे ।अब ऐसा होना मुश्किल है इसी लिए प्रत्याशी नही चुन पा रहा है ।

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