महिला दिवस पर सोनी सब के महिला कलाकारों ने रखी अपनी बात

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स्मिता बंसल (‘अलादीन: नाम तो सुना होगा’  में अम्मीह)

मेरे लिये, तो हर दिन ही वुमन्सी डे होता है, क्योंमकि महिलाओं के लिये मैं केवल एक दिन मनाने पर भरोसा नहीं करती हूं, जो बेहद दमदार और सशक्तब हैं। हालांकि, किसी ना किसी रूप में यह सही भी है कि हम इस? दिन को मनाते हैं, क्योंोकि कम से कम लोग इस बात पर ध्यािन तो देते हैं कि महिलाएं क्या करती हैं और वे उन्हें शुक्रिया कहते हैं तथा उनका आभार व्य क्त? करते हैं। मेरे विचार से, वुमन्स डे अपने आप में एक सशक्ता दिन है, जिसमें यह संदेश दिया जाता है कि महिलाओं को जश्नद मनाने की जरूरत है।महिलाएं इस समाज के स्तंशभों में से एक हैं और लोगों को उन्हेंय नीचा दिखाना बंद कर देना चाहिये। साथ ही अक्सवर यह देखा जाता है कि महिलाएं ही महिला की दुश्मएन होती है; उन्हेंच इस बात की चिंता सताती रहती है कि दूसरी महिला क्या कर रही है। इसकी बजाय महिलाओं को अपनी ताकत पहचाना शुरू कर देना चाहिये और इसके बाद हर कोई उन्हेंा सशक्त बनाने में मदद कर सकते हैं।

 

निया शर्मा (‘तेनाली रामा’ में शारदा)

मैं अपने पेरेंट्स की इकलौती संतान हूं और मुझे इस तरह से बड़ा किया गया है कि मैं बेटी होने के साथ-साथ उनका बेटा भी हूं। मेरे विचार से महिला और पुरुष समान होते हैं और इसलिये, केवल एक दिन महिलाओं के लिये नहीं मनाना चाहिये। मेरे हिसाब से हर दिन वुमन्स डे होता है क्यों कि महिलाएं वाकई बहुत सशक्तय होती हैं। अपनी मां को देखकर मुझे यह बात महसूस होती है, जोकि बेहद सशक्तै महिला हैं और हमारे लिये काफी कुछ किया है। इसलिये, इस वुमन्सह डे पर मेरा हर किसी से यही कहना है कि महिलाओं का सम्मायन शुरू कर देना चाहिये। उन्हेंप इस आधार पर जज नहीं करना चाहिये कि उन्हों ने क्याय पहना है, उनका व्यशवहार कैसा है या उनके शब्दं कैसे हैं। इस बात के लिये उनकी प्रशंसा होनी चाहिये कि वो क्या हैं।

आशिता मुद्गल (‘भाखरवड़ी’ में गायत्री)

मुझे लगता है कि वुमन्सो डे उन महिलाओं के प्रति अपना सम्मा न व्य क्त् करने का एक मौका होता है जिन्हें आप प्याहर करते हैं या फिर जो आपकी जिंदगी में अहम भूमिका निभाती हैं। खासतौर से हमारी मांएं हमारे लिये और पूरे घर के लिये काफी कुछ करती हैं। उन्हें बेहद प्याार और सरहाना की जरूरत है। मैं हमेशा ही अपना वुमन्सय डे अपनी मां के साथ मनाती हूं। मैं और मेरी बहन उस दिन अपनी मां को पूरा आराम देने की कोशिश करते हैं , क्यों कि वह सारा दिन कुछ ना कुछ करती रहती हैं या फिर औरों के लिये कुछ ना कुछ करती रहती हैं। इसलिये, इस वुमन्सि डे मैं सबसे यह गुजारिश करना चाहती हूं कि हर किसी को उनके जीवन में जो भी महिला है उनके लिये कुछ खास करना चाहिये, चाहे वह उनकी मां हों, बहन हों, दोस्तव या फिर कोई और। उनके प्रति अपना सम्मालन व्यरक्त, करें और उन्हें यह अहसास करायें कि उनके जीवन में वे कितनी अहम भूमिका निभाती हैं।

शिवानी बाडोनी (‘बावले उतावले’ में फुंटी)

एक महिला आपके जीवन में कितना प्या र, खुशहाली और आनंद लेकर आती है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है और यह जानकर अच्छान लगता है कि महिलाओं को सम्मांन देने के लिये हमारे पास एक खास दिन है, जबकि हर दिन यह दिन मनाना चाहिये। मैं अपनी मां के बहुत करीब हूं और उनके इस दिन को मैं उनके साथ फिल्मए देखकर और लंच पर जाकर, उनके साथ कुछ क्वा लिटी टाइम बिताकर मनाती हूं। हालांकि, इस बार मैं मुंबई में हूं और वह देहरादून में हैं, मैं उन्हेंक बहुत मिस करूंगी। हर किसी से मेरी यही गुजारिश है कि उनके जीवन में जो महिलाएं उनके लिये इतनी सारी खुशियां लेकर आती हैं उसका उन्हेंम उत्सरव मनाना चाहिये। क्योंलकि इस बात का उन्हें  खुद अहसास भी नहीं होता है। साथ ही मैं सारी महिलाओं से ये कहना चाहूंगी कि खुद की और अपने आस-पास की महिलाओं की सराहना करके और उन्हेंा खुशी देकर इस दिन का जश्नक मनायें।

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