सौरभ वार्ष्णेय
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव न केवल पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि दक्षिण एशिया के देशों, विशेषकर पाकिस्तान, के लिए भी एक कठिन कूटनीतिक की परीक्षा बनकर रह गया है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, उसकी सैन्य-रणनीतिक अहमियत और इस्लामी देशों के साथ उसके रिश्ते इस संकट में उसकी भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बना देते हैं। वहीं चीन की चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। वह सीधे मंच पर आने के बजाय पर्दे के पीछे से प्रभाव डालकर अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। अगर ऐसे में युद्वविराम दो हफ्ते की वजाह पूरी तरह से सफल हो जाता है इसमें चीन का ही फायदा होगा? क्योंकि फिर से अमेरिका तेल ऊर्जा की महाशक्ति बनते बनते रह जायेगा?
आज अमेरिका -ईरान के बीच भले ही दो ह$फ्ते का युद्व विराम हो गया है लेकिन पूरी तरह से हो गया है यह कहना बेईमानी होगी? युद्वविराम का अर्थ है कि शांति ? अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्व पश्चिम एशिया के लिए ही नहीं बरन पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा संकट को खतरा बढ़ गया वहीं दक्षिण एशिया के देशों, विशेषकर पाकिस्तान, के लिए भी एक कठिन कूटनीतिकार की भूमिका में ला खड़ा किया। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति को देखा जाये तो उसकी सैन्य-रणनीतिक अहमियत और इस्लामी देशों के साथ उसके रिश्ते इस संकट में उसकी भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि इसके पीछे असली दिमाख तो चीन का लगा है। यानी जैसे अमेरिका खुद न लड़कर दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक चलाता है वैसे ही पैतरा चीन ने सीख लिया। चीन ने भी पाकिस्तान को मोहरा बनाकर इस संकट से उबरने के लिए उसे अपना मोहरा बनाया। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका यह सब जानता न हो ? लेकिन इस समय इजरायल के जाल में फंसकर जैसा कि इजरायल शुरु से चाहता है कि ईरान को नेस्ताबूंद किया जाये। अब ऐेसे समय में अमेरिका ने दो २ ह$फ्ते का युद्व विराम घोषित कर पाकिस्तान को इसका क्रेडिट दे दिया। वहीं इजरायल अब भी युद्व छेड़ हुए हैं जिससे ईरान ने होर्मूज को फिर से बंद करना पड़ा है। यानी ऊर्जा संकट फिर से खड़ा हुआ। अब पाकिस्तान की रणनीति कहां गई हालांकि पाकिस्तान में बातचीत के लिए मेज सजाई जा रही है। लेकिन चीन जैसे चाहता है वैसे शतरंज के प्यादे की तरह पाकिस्तान को चला रहा है। पाकिस्तान को पूरी तरह मोहरा कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह भी सच है कि उसकी विदेश नीति अक्सर आर्थिक और सैन्य निर्भरता से प्रभावित होती है। अमेरिका के साथ उसका इतिहास रहा है वहीं, चीन के साथ उसका गहरा रणनीतिक रिश्ता है । इसलिए पाकिस्तान कई बार संतुलन बनाने वाला खिलाड़ी बन जाता है, न कि केवल मोहरा।
अगर गौर किया जाये कि चीन का असली हित क्या है?तो इससे चीन पूरे समीकरण में ज्यादा बड़ा और दीर्घकालिक खिलाड़ी है। ईरान उसके लिए ऊर्जा (तेल-गैस) का अहम स्रोत है।उसकी बेल्ट एंड रोड रणनीति का हिस्सा है। चीन नहीं चाहता कि अमेरिका मध्य-पूर्व में पूरी तरह हावी हो। इसलिए चीन सीधे युद्ध में कूदे बिना बैकग्राउंड स्ट्रेटेजी से अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। तो क्या चीन पर्दे के पीछे है?चीन आमतौर पर खुलकर सैन्य हस्तक्षेप से बचता है आर्थिक, कूटनीतिक और अप्रत्यक्ष समर्थन देता है। इसलिए यह कहना कि असली किरदार चीन है कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन वह पर्दे के पीछे रहकर खेलता है, न कि खुले युद्ध में।अगर अमेरिका और ईरान में बड़ा टकराव होता है तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा कि वह किसी एक पक्ष के करीब जाए। चीन इस स्थिति का इस्तेमाल अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कर सकता है। पूरे एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है। कहने का आशय है कि पाकिस्तान को केवल मोहरा कहना सरलीकरण होगा। वह एक मिड-लेवल स्ट्रेटेजिक प्लेयर है, जो अपनी मजबूरियों और हितों के बीच संतुलन बनाता है। वहीं चीन एक बड़ा खिलाड़ी है, जो सीधे नहीं बल्कि रणनीतिक तरीके से पूरे खेल को प्रभावित करता है।
चीन सीधे मध्यस्थता क्यों नहीं करता?
अब प्रश्र उठता है कि चीन सीधे मध्यस्थता क्यों नहीं करता? इसका कारण भी जान लें कि वैश्विक राजनीति में चीन की भूमिका लगातार बढ़ रही है, लेकिन जब बात सीधे मध्यस्थता की आती है—खासतौर पर अमेरिका- ईरान जैसे संवेदनशील विवादों में—तो चीन अक्सर परोक्ष रास्ता अपनाता है। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर चीन खुलकर मध्यस्थता क्यों नहीं करता?सबसे पहले ‘लो-प्रोफाइल कूटनीति की रणनीति। चीन पारंपरिक रूप से शांत शक्ति में विश्वास करता है। वह बिना शोर-शराबे के पर्दे के पीछे से बातचीत को प्रभावित करना चाहता है, ताकि असफलता की स्थिति में उसकी साख पर आंच न आए।दूसरा आर्थिक हितों की प्राथमिकता। यानी चीन का मुख्य फोकस व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा है। मध्य पूर्व से उसे बड़े पैमाने पर तेल मिलता है। खुलकर किसी एक पक्ष की मध्यस्थता करने से उसके व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं, खासकर सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ।तीसरा ‘नॉन-इंटरफेरेंस नीति अपनाना। चीन की विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत है—दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना। सीधे मध्यस्थता करना कई बार इस सिद्धांत के खिलाफ माना जाता है, इसलिए वह सावधानी बरतता है।चौथी अमेरिका से टकराव से बचाव। अमेरिका अब भी वैश्विक राजनीति में प्रमुख शक्ति है। चीन खुलकर मध्यस्थता करेगा तो इसे रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है, जिससे दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव और बढ़ सकता है।पांचवा ‘सही समय का इंतजार। चीन अक्सर तब सामने आता है जब उसे सफलता की संभावना ज्यादा दिखती है—जैसे ईरान-सऊदी समझौता 2023। इससे वह “सफल मध्यस्थ की छवि बनाता है।चीन की चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। वह सीधे मंच पर आने के बजाय पर्दे के पीछे से प्रभाव डालकर अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि चीन मध्यस्थ कम और संतुलन साधने वाला खिलाड़ी ज्यादा है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
