सौरभ वार्ष्णेय
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि देश की जनता की आकांक्षाओं, समस्याओं और भविष्य की दिशा तय करने वाला सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है। यहां सत्ता और विपक्ष दोनों जनता के प्रतिनिधि के रूप में बैठते हैं। सत्ता पक्ष सरकार चलाने के लिए जनादेश लेकर आता है, जबकि विपक्ष सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और आवश्यक सुधारों का सुझाव देने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। जब संसद सुचारु रूप से चलती है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है; लेकिन जब संसद लगातार गतिरोध का शिकार होती है, तब केवल सदन का समय ही नष्ट नहीं होता, बल्कि जनता का विश्वास भी कमजोर होने लगता है।
हाल के वर्षों में संसद के प्रत्येक सत्र में किसी न किसी मुद्दे को लेकर गतिरोध देखने को मिलता है। कभी विपक्ष सरकार से किसी विषय पर चर्चा की मांग करता है, तो कभी सरकार विपक्ष पर सदन नहीं चलने देने का आरोप लगाती है। परिणाम यह होता है कि प्रश्नकाल स्थगित हो जाता है, विधेयक बिना व्यापक बहस के पारित हो जाते हैं और जनता के करोड़ों रुपये का समय और संसाधन व्यर्थ चला जाता है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद यदि संवाद के स्थान पर टकराव का रूप ले लें, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
संसद में हंगामा कोई नई बात नहीं है। भारतीय संसदीय इतिहास में कई बार तीखी बहसें हुई हैं, विरोध प्रदर्शन हुए हैं और सदन की कार्यवाही बाधित भी हुई है। किंतु अतीत में लंबे और गंभीर विमर्श भी होते थे। विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा करता था, सरकार जवाब देती थी और अंतत: जनता के सामने तथ्य आते थे। आज स्थिति यह है कि बहस की जगह नारेबाजी और संवाद की जगह राजनीतिक रणनीति ने ले ली है। इससे संसद की गरिमा प्रभावित होती है।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विपक्ष केवल सरकार का विरोध करने के लिए नहीं होता, बल्कि वह वैकल्पिक सोच प्रस्तुत करता है। यदि सरकार कोई गलत निर्णय लेती है तो उसे रोकना, जनता की समस्याओं को सदन में उठाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना विपक्ष का दायित्व है। दूसरी ओर सरकार का दायित्व है कि वह विपक्ष की बात सुने, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कराए और संसद को विश्वास में लेकर आगे बढ़े। यदि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का संतुलन खो देते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।
आज संसद में अनेक महत्वपूर्ण विषय चर्चा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा विवाद, डिजिटल अपराध, पर्यावरण संरक्षण, न्यायिक सुधार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौतियां तथा आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे व्यापक बहस की मांग करते हैं। दुर्भाग्य यह है कि इन विषयों पर गंभीर चर्चा कम और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अधिक दिखाई देते हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को नारे लगाने के लिए नहीं, बल्कि समाधान खोजने के लिए संसद भेजती है।
संसदीय परंपराओं का सम्मान लोकतंत्र की मजबूती की पहली शर्त है। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण आज करोड़ों लोग देखते हैं। युवा पीढ़ी अपने जनप्रतिनिधियों से सीखती है कि लोकतंत्र में असहमति कैसे व्यक्त की जाती है। यदि संसद में लगातार शोर-शराबा, नारेबाजी और अव्यवस्था दिखाई देगी, तो समाज में भी संवाद की संस्कृति कमजोर होगी। लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान भी है।
एक गंभीर प्रश्न यह भी है कि संसद का बहुमूल्य समय बार-बार नष्ट होने की कीमत कौन चुकाता है? संसद चलाने में प्रतिदिन करोड़ों रुपये का खर्च आता है। यह धन करदाताओं की मेहनत की कमाई है। जब सदन की कार्यवाही बिना किसी सार्थक चर्चा के स्थगित हो जाती है, तब यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी नुकसान होता है। जनता यह अपेक्षा करती है कि उसके प्रतिनिधि हर मिनट का उपयोग उसके हित में करें।
विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है। किसी भी कानून का प्रभाव वर्षों तक समाज पर पड़ता है। यदि विधेयक बिना पर्याप्त बहस के पारित हो जाएं, तो भविष्य में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। कानून बनाने की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी और विचारपूर्ण होगी, कानून उतने ही प्रभावी और स्वीकार्य होंगे। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर विपक्ष को पर्याप्त समय दे और विपक्ष को भी रचनात्मक सुझावों के साथ बहस में भाग लेना चाहिए।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि मीडिया केवल राजनीतिक टकराव को प्रमुखता देगा और गंभीर संसदीय बहसों को पर्याप्त स्थान नहीं देगा, तो राजनीतिक दल भी सुर्खियां बटोरने वाली राजनीति को प्राथमिकता देंगे। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व केवल विवाद दिखाना नहीं, बल्कि नीति, कानून और जनहित के मुद्दों पर सार्थक विमर्श को बढ़ावा देना भी है।
संसद में गतिरोध का एक कारण राजनीतिक ध्रुवीकरण भी है। आज राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद स्वाभाविक सीमा से आगे बढ़कर व्यक्तिगत और स्थायी विरोध का रूप लेते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए। संसद में सत्ता और विपक्ष प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं, शत्रु नहीं। यदि यह भावना विकसित हो जाए कि देश पहले और राजनीति बाद में, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वत: संभव हो जाएगा।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अनेक विकासशील देश भारत की संसदीय व्यवस्था को आदर्श मानते हैं। ऐसे में हमारी संसद का आचरण केवल देश के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व समुदाय के लिए भी संदेश देता है। यदि संसद निरंतर गतिरोध का प्रतीक बनेगी, तो यह भारत की लोकतांत्रिक छवि को भी प्रभावित करेगा। इसलिए प्रत्येक सांसद की जिम्मेदारी व्यक्तिगत और दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दायित्व निभाने की है।
संसद को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ व्यावहारिक सुधारों पर भी विचार किया जाना चाहिए। सभी दलों के बीच नियमित सर्वदलीय बैठकें हों, विवादित विषयों पर पहले से सहमति बनाने का प्रयास हो, संसदीय समितियों को और अधिक सशक्त बनाया जाए तथा प्रश्नकाल और शून्यकाल की गरिमा को हर परिस्थिति में बनाए रखा जाए। साथ ही, बार-बार सदन की कार्यवाही बाधित करने वाले सदस्यों के विरुद्ध संसदीय नियमों के अनुरूप निष्पक्ष कार्रवाई भी आवश्यक है। नियमों का पालन सत्ता और विपक्ष—दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि सांसद स्वयं को केवल राजनीतिक दल का प्रतिनिधि न मानें, बल्कि पूरे निर्वाचन क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधि समझें। उनके निर्वाचन क्षेत्र के नागरिक यह जानना चाहते हैं कि संसद में उनके प्रतिनिधि ने कितने प्रश्न पूछे, किन मुद्दों पर चर्चा की, कितनी समितियों में भाग लिया और क्षेत्र के विकास के लिए क्या प्रयास किए। लोकतंत्र में जनता की यह निगरानी भी संसद की कार्यक्षमता बढ़ा सकती है।भारतीय संविधान ने संसद को सर्वोच्च विधायी संस्था का दर्जा दिया है। संविधान निर्माताओं ने यह कल्पना नहीं की थी कि संसद लगातार गतिरोध का मंच बन जाएगी। उन्होंने ऐसी संसद की परिकल्पना की थी, जहां तर्क, तथ्य, शालीनता और संवैधानिक मर्यादा सर्वोच्च हों। डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित संविधान सभा के अनेक सदस्यों ने लोकतंत्र में संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत मर्यादा के महत्व पर विशेष बल दिया था। आज उन आदर्शों को पुन: स्मरण करने की आवश्यकता है।सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत संवाद का विकल्प नहीं हो सकता। विपक्ष की बात सुनना लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत है। वहीं विपक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का उद्देश्य संसद को ठप करना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाना होना चाहिए। विरोध तब सबसे प्रभावी होता है, जब वह तथ्यों, तर्कों और जनहित के आधार पर किया जाए।
जनता भी इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण भागीदार है। लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों से प्रश्न पूछने चाहिए, उनके संसदीय प्रदर्शन का मूल्यांकन करना चाहिए और केवल राजनीतिक नारों के बजाय नीति आधारित राजनीति को प्रोत्साहित करना चाहिए। जब मतदाता विकास, बहस और जवाबदेही को प्राथमिकता देंगे, तब राजनीतिक दल भी अपनी रणनीति बदलने के लिए विवश होंगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद फिर से विचारों के महाकुंभ के रूप में स्थापित हो। जहां असहमति हो, लेकिन कटुता न हो; जहां विरोध हो, लेकिन अवरोध न हो; जहां सत्ता जवाब दे और विपक्ष समाधान प्रस्तुत करे; जहां कानून जल्दबाजी में नहीं, बल्कि व्यापक विमर्श के बाद बनें। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
संसद का गतिरोध किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की चिंता है। संसद जितनी प्रभावी होगी, लोकतंत्र उतना ही सशक्त होगा। सत्ता और विपक्ष दोनों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे अंतत: जनता के सेवक हैं, प्रतिद्वंद्वी अवश्य हैं पर लोकतंत्र के साझेदार भी हैं। भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को नई ऊर्जा तभी मिलेगी, जब संसद में शोर नहीं, संवाद होगा; टकराव नहीं, समाधान होगा; और राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान दिया जाएगा। यही लोकतंत्र की गरिमा है और यही संसद की वास्तविक पहचान भी होनी चाहिए।
